Wednesday, 14 October 2020

तलाकशुदा दोस्त 💔


 


सुनो यार, 

किताबों के पन्नो को पलटते हुए आज तुम्हारे साथ खिचवाई पुरानी तस्वीर मिली। उस देख एक बात समझ आ गई कि ये जरूरी नही जो हमारे साथ तस्वीर में होते हैं। वो ताउम्र हमारी  तकदीर में भी हों। वैसे बहुत अरसा बीत गया है तुम्हें जी भर निहारे हुए। मुझे नही पता था तलाक एक हँसते खेलते रिश्ते को राख बना खाक कर देता है। सच बताऊँ यार अब थक गया हूँ,जीवन की इस भाग दौड़ से।अब लगता हैं कि रख दूँ तुम्हारे आँचल में अपना सिर और तुम अपनी उंगलियों की पोरों को मेरे बालों के बीच बने रास्ते में भटकाओ। अब तो कोई उम्मीद भी नही है।हमारे साथ आने की पर ना जाने क्यूँ मन करता है। कि हम फिर मिलें,अंजान बनकर जैसे हम मिले थे कॉलेज के ग्राउंड में।हमने प्रेम करते वक्त और शादी करते वक्त कभी सोचा ही कहाँ था अपने अलग होने विषय में। काश उस रोज तुम्हें रोक लेता मैं अपने जीवन से दूर जाने से। जिन चंद पन्नो में प्रेम पत्रों का रूप बनकर हमने मिलाया था। आज वही चंद पन्ने तलाक के कागज बन हमें अलग कर रहें हैं। सुनो फिर मिलते हैं ना। पूर्व पति पत्नी नही बल्कि वो ही 10 साल पुराने वाले दोस्त बनकर.....

..तुम्हारा तलाकशुदा पति..... 

... #©जलज कुमार


Saturday, 10 October 2020

वचनवद्ध पति... 😘



 



 सुनो प्रिय, 

ख्वाहिश तो हमेशा से ही थी कि तुम्हारे साथ हनीमून पर बाली जाउँगा। लेकिन जिंदगी की उलझनो ने इस छोटी सी ख्वाहिश को भी तुम्हारे कानो की बाली और होठों की लाली तक समेट दिया। चाहता तो मैं भी था कि तुम्हारे साथ सूरज को सांझ का होते देखूँ  और तुम्हारे हाथों में हाथ डाल समन्दर की लहरों को चिडाऊँ। लेकिन चाहतों का पूरा होना आसान कहाँ होता है। तुम जो मुझे सर्दी होने पर काड़ा बनाकर देती हो सोचा था कभी कुल्लू या मनाली में ऐसे ही तुम्हारे संग पिऊंगा  ये काडा।लेकिन जीवन की उलझनों ने मेरे अंगिनत सपनो के बागों को उजाड़ दिया है। लेकिन तुमसे वादा करता हूँ। हवाई जहाज से अपने शहर  को देखने का तुम्हारा सपना एक दिन जरूर पूरा करूँगा। मुझे पता है तुम समझती हो मुझे तभी तो सालों  साल गुज़ार देती हो मायके से मिली एक या दो साड़ियों में। लेकिन इस बार वादा रहा तुमसे की करवाचौथ को तुम्हे अपना आसमां जरूर बनाऊंगा। ....तुम्हारा ....वचनवद्ध प्रिय

.. #जलज कुमार


एक वाजिब वजह.... ❤

 प्रिय कॉमरेड, 


  सुनो यार, 

जीवन के इस पड़ाव पर आज तुम्हारी कमी खल रही है।  मुझे नही पता हर रोज क्यूँ तुम्हारा ख्याल अक्सर मेरे ख्याल  में आ जाता है। लेकिन आज तुम्हारी याद आने की मेरे पास एक वाजिब वजह है। तुम जो मेरी हर खुशी का ख्याल रखती थीं। न जाने क्यूँ अब जानबूझ कर मुझसे नाराज हो। सच मैं नहीं बर्दाश्त होती एक छोटी से भूल की इतनी बडी सजा। शरीर से आत्मा को छीन उससे आत्मीयता दिखाने का कोई महत्व नही रहता। व्यक्ति खुद को तो कुछ समय बाद बदल लेता है। लेकिन मुझमें तो तुम आज भी विद्यमान हो जैसे दोपहर में चाँद,जन्म और मरण के इस भँवर में फंसे मानव को एक प्रेम ही तो आनंदित करता है। बढती उम्र के इस पड़ाव के साथ मैं हर एक क्षण तुमसे कोसों दूर जाता हूँ। मुझे नही पता हम किस चौक या चौराहे पर वापस मिलेंगे।क्युकी मैने मंजिलों से उम्मीदों को रखना छोड़ दिया है। हाँ रास्तों पर थोड़ा भरोसा आज भी है।मुझे नही पता तुम दिन भर में कितनी हिचकियाँ लेती हो पर ये जरूर है कि मेरी कई रातें जरूर  तुम्हारा स्मरण कर सिसकियों में बीतीं हैं। पता नही तुम्हें उस वजह की वजह पता है कि नही जिस वजह से आज  मुझे तुम्हारी कमी खल रही है।खैर छोड़ो..... 

सिर्फ तुम्हारा,

... #जलज राठौर


Friday, 9 October 2020

आँसुओं से भरी मांग

 


आँखों में आँसू तुम्हारी, 

आएंगे उस दिन जरूर, 

कोई गैर तन जब , 

होगा तुम्हारी साँसों में मगरूर, 

हस्त रेखाओं को अपनी

मैं दोष देकर जी भी लूंगा, 

दर्द के आँसू उंजरी भर भी लूंगा,

मगर सोचता हूँ कैसे तुम

रह पाओगी मेरी बाहों से दूर,

आँखों में आँसू तुम्हारी, 

आएंगे उस दिन जरूर,

जब कोई अनचाहा शक्स

भरेगा तुम्हारी मांग में सिंदूर,

जब भी देखूँगा अब तुम्हें, 

सोलह  श्रृंगार तुम्हारे चिढायेंगे मुझे 

मुलाकातों मैं हमारी, 

पास होकर भी हम होंगे दूर, 

आँखों में आँसू तुम्हारी, 

आएंगे उस दिन जरूर,

.... #जलज कुमार


Thursday, 8 October 2020

मोहल्ले वाले बड़े भैया,



 मोहल्ले वाले बड़े भैया, 



Part_१

शर्मा जी के बड़े बेटे को, मेरे साथ के और मुझसे छोटे मोहल्ले के सभी लड़के बड़े भैया कहकर बुलाते थे। बड़े भैया बचपन से ही पढ़ने में तेज थे। अपने स्कूल में टॉप करने के बाद उन्होंने किसी सरकारी कॉलेज से इंजीनियरिंग की थी। उस रोज 28 जून का दिन था। जब मेरा प्रवेश शहर के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में हुआ था।मैं भैया को बताने उनके घर पर गया था। भैया अपने छत वाले रूम में लेटे हुए थे। मुझे देख बोले "क्या टॉपर कौन सा कॉलेज मिला इंजीनियरिंग में ", " भैया अपना एच. बी. टी. आई. ही मिल गया " मैंने बोला। भैया खुश होते हुए अपने कमरे की टंगी तस्वीर की ओर देखने लगे और बोले "कभी मैंने भी इसी कॉलेज की परीक्षा में टॉप किया था" फिर उदास होकर मेरे पास बैठे गए।

तुझे पता है टॉपर मैं बचपन से पढ़ने में होशियार था। हमेशा क्लास में तेरी ही तरह टॉप मारता था। मेरी ही क्लास की एक लड़की थी। बहुत पसंद करता था मैं उसको और वो भी करती थी। पता है यार जीवन में कुछ पसंदे सिर्फ पसंद ही बनकर रह जाती हैं।

पार्ट-२

उसके साथ कभी वक्त का पता ही नहीं लगता था। इन्ही हँसी और मुस्काराहटो में कब कॉलेज ख़तम हो गया पता ही नही चला। वो हमेशा कहती थी कि "यार बनना तो IAS ही है।" बस उसी दिन से उसके सपने को अपना बना लिए थे। दिन रात मेहनत करते थे। इस चक्कर में उससे बात भी बन्द हो गयी थी। धीरे धीरे हमारे बीच सब खत्म सा हो गया। यार टॉपर जिसके बिना एक मिनिट भी मन नही लगता था। आज उसके बिना २ साल गुजार दिये हैं। आज जब पीछे देखता हूँ तो मेरे साथ कुछ भी अपना नही है। सपना भी किसी और का है। ......... 

..... #जलज कुमार

 ...... 

Wednesday, 7 October 2020

कैंसर वाला तारा.. ❤😔

 


सुनो यार, 

आसमां में जब भी देखता हूं तो टिमटिमाते हुए तारों में तुम्हारा अश्क दिखाई देता है। वो छत की मुंडेर पर मेरे साथ रात में बैठकर तुम ही तो कहती थी कि "मेरे इस दुनियाँ में ना होंने पर तुम आसमां में मुझे ढुंढ़ना और जब भी कोई तारा टिमटिमाए तो समझ जाना मैं तुम्हें देख पलको को झपका रही हूँ" और मैं तुम्हारे कंधे पर सिर रख उदास हो जाता था। यार कभी कभी लगता है कि यह अच्छा ही है कि हमें हमारी मौत का पता, पता नहीं होता है। वरना हम में से ना जाने कितनो ने रास्तों पर चलने का हौंसला ही न किया होता। लेकिन मेरे संग चलने का तुम्हारा ये हौंसला कैंसर जैसी बीमारी के भी हौंसले पस्त कर देता था। तुम्हारी जुल्फों में उंगली फंसा अपनी उलझने दूर करने वाला मैं तुम्हें बिन बालों के देख अंदर ही अंदर घुटन महसूस करता था।जिस दिन तुम मुझे छोड़ कर गयीं थी उसी दिन से मैंने आसमां में टिमटिमाते तारों से दोस्ती कर ली थी।इस उम्मीद में कि तुम अपना ये वादा तो पूरा करोगी।

... #जलज 

Tuesday, 6 October 2020

घर घर वाला हमसफर ❤



सुनो यार देखो न,

कन्चे, लपो, घर- घर , किच किच, गिल्ली दंडा, पोसम पाई, लुका छिपी,पिड्डू, गेंदतडी, ऊंच नीचे, जैसे अनगिनत खेल हमारे जीवन से लुप्त हो रहे हैं। जैसे हम एक दूसरे की यादों से हो रहे हैं। आज भी जब सोचता हूँ काश बचपन की तरह तुम पीछे से आकर धप्पी मार कर  छू लो मुझे। मेरे लिए,तुम्हारा स्पर्श मानो प्यासे को पानी। गेंदतडी में तुम्हारे द्वारा मारी गयी गेंद में भी प्रेम ढूँढने वाला मैं, पोसम पाई के खेल में तुम्हारे साथ जेल में  भी जाने को तैयार था। लपो में जैसे तुम हाथ बढाकर मुझे पेड़ पर चढ़ाती थी। बस ऐसे ही तुम जमाने से छिपकर हर पल मेरी मुसीबतों में मेरा हौसला बढाती रहना। पता नहीं हम फिर से जमाने से लुका छिपी कर के मिल पायेंगे या नहीं पर हाँ एक ख्वाहिश जरूर थी कि घर- घर के  खेल की तरह मैं सदैव तुम्हारा हमसफर बनूँ। 

..... #जलज कुमार


Monday, 5 October 2020

वो कहती थी.....

 



वो कहती थी,

यार तुम जैसे हो वैसे ही रहो। मैं बात तो करती हूँ न तुमसे और मैं उससे अक्सर कहता था कि "यार बेनाम रिश्ते अक्सर बदनाम होते हैं।प्रेम सिर्फ कृष्ण और राधा का पवित्र माना जाता है वरना इनके सिवा हर प्रेम परीक्षाओं से गुजरा है। ये वही समाज है जिसने पवित्रता के लिए माँ सीता की अग्नि परीक्षा लीं है।"शायद हमारी ये बातें हमारे रिश्ते को बदल चुकी थी। हम कोशों दूर निकल आये थे। उन कस्मों और वादों से जिनमें एक दूजे का साथ जरूरी होता है।हमारे प्रेम से पहले हमारे लिए हमारा परिवार और उनकी खुशीयां थी। हम सम्भालते थे  एक दूसरे को, नाराज होते थे एक दूसरे से, मैं अक्सर उससे पूछ बैठता था " कि क्या हम फिर कब और कहां साथ होंगे", वो बोलती थी "शायद आसमां में तारा बनकर"

... #जलज कुमार

Sunday, 4 October 2020

बौराया हुआ आम का पेड़



 सुनो यार, 

प्रेम की पगडंडियों पर तुम्हारे संग बेखौफ चलने वाला मैं, आज कल डर जाता हूँ जमाने की बनाई इन रीति- रिवाज की सड़को से। तुम्हारी चुनरी को थाम ,जुनरी के खेत की मेड़ों से होते हुए।जब हम तालाब के किनारे आम के पेड़ पर पहुँचते थे तो ऐसा लगता था जैसे कि अपनी एक अलग दुनियाँ में आ गए हों। आम के पेड़ से एक चीज जरूर सीखा था। कि प्रेम आम के फल की तरह होता है। अपरिपक्व हो तो कड़वा लगता है,अर्धपरिपक्व हो तो उसमें कड़वाहट और मिठास दोनो  महसूस होता है और जब पूर्ण परिपक्व हो जाता है तो सिर्फ मिठास देता है और अपनी खुशबू से अपने आस पास के लोगो को आनंदित करता है। हम एक दूसरे प्रेम में तो उस समय आम के पेड़ की तरह बौराये(आम के फल के बीज का आना) हुए थे। 

... #जलज कुमार


Thursday, 1 October 2020

बहिन लाडो - एक अजनबी भाई का खत

 

बहिन लाडो,

मैं ना ही तुम्हारा नाम जानता हूँ, न ही तुम्हारी जाति या धर्म। तुमसे मेरा वैसा कोई रिश्ता भी नहीं है कि मैं तुमसे कभी मिला होऊँ। लेकिन कुछ सवाल मन मैं आज भी हलचल करते है  कि किसी के साथ हुए अन्याय के लिए लड़ने पर उससे किसी रिश्ता का होना जरूरी है क्या? मुझे पता है कि कुछ दिन या महिनो तक सड़को पर तुम्हारी तस्वीर के सामने मोमबत्तियाँ पिघलेंगी, हो सकता है कुछ लोगो को राजनीतिक फ़ायदा भी हो जाए लेकिन क्या इन सबके बाद मेरी बहन या इस देश की कोई भी बेटी खुद को सुरक्षित महसूस करेगी। मैं तुमसे ये नही कहूंगा कि ये दुनियाँ तुम्हारे रहने लायक नही रही बल्कि ये कहूंगा कि हमारे जैसे लडको के अंदर छिपे बहसी दरिंदो ने इसको तुम्हारे रहने लायक रहने नही दिया। आज हमारे जैसे वो हजारों लड़के तुम्हारे लिए इंसाफ मांगेंगे जो किसी लड़की को देख सबसे पहले उसकी शारीरिक अंगो के आधार पर उसकी सुंदरता को तय करते हैं।हो सकता है मेरे अंदर भी छिपा हो कोई एक दरिंदा पर से शायद मेरी बहिन और बेटी की तस्वीर उसको इंसान बनाये रखे होगी या हो सकता है,शायद मेरे संस्कार। बहिन लाडो, मैं आज प्रतिज्ञा करता हूँ कि भले ही मै  तुम्हारा लिए मोमबत्ती ना जला सकूँ पर हाँ आज से अधिक कोशिश जरूर करूँगा कि प्रत्येक स्त्री को दुगने सम्मान से देखूं। तुम जब दोबारा जन्म लेना तो बनना मेरी बहिन या बेटी और मै  कोशिश करूँगा तुम्हारे लिए बेहतर समाज बनाने की।
तुम्हारा अजनबी भाई
...जलज कुमार

"क्लीनिक प्लस वाली"

 प्रस्तावना: ये कहानी छोटे से कस्बे में रहने वाले दो 16 साल के बच्चों की है। प्रेम की अलग अलग परिभाषाओं की सहायता से समाज के बनाए रास्तों पर...