सुनो प्रिय,
ख्वाहिश तो हमेशा से ही थी कि तुम्हारे साथ हनीमून पर बाली जाउँगा। लेकिन जिंदगी की उलझनो ने इस छोटी सी ख्वाहिश को भी तुम्हारे कानो की बाली और होठों की लाली तक समेट दिया। चाहता तो मैं भी था कि तुम्हारे साथ सूरज को सांझ का होते देखूँ और तुम्हारे हाथों में हाथ डाल समन्दर की लहरों को चिडाऊँ। लेकिन चाहतों का पूरा होना आसान कहाँ होता है। तुम जो मुझे सर्दी होने पर काड़ा बनाकर देती हो सोचा था कभी कुल्लू या मनाली में ऐसे ही तुम्हारे संग पिऊंगा ये काडा।लेकिन जीवन की उलझनों ने मेरे अंगिनत सपनो के बागों को उजाड़ दिया है। लेकिन तुमसे वादा करता हूँ। हवाई जहाज से अपने शहर को देखने का तुम्हारा सपना एक दिन जरूर पूरा करूँगा। मुझे पता है तुम समझती हो मुझे तभी तो सालों साल गुज़ार देती हो मायके से मिली एक या दो साड़ियों में। लेकिन इस बार वादा रहा तुमसे की करवाचौथ को तुम्हे अपना आसमां जरूर बनाऊंगा। ....तुम्हारा ....वचनवद्ध प्रिय
.. #जलज कुमार

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