Friday, 17 December 2021

"क्लीनिक प्लस वाली"

 प्रस्तावना: ये कहानी छोटे से कस्बे में रहने वाले दो 16 साल के बच्चों की है। प्रेम की अलग अलग परिभाषाओं की सहायता से समाज के बनाए रास्तों पर चलकर वो अपनी मंजिल तक जाना चाहते हैं।देखिए कितनी दूर तक चलता है ये साथ। आप छोड़िए ना इस कहानी के नायक पार्थ और नायिका प्रार्थना का हाथ।.#जलज कुमार



                * क्लिनिक प्लस वाली*

सर्दी की सुबह कोहरे से ढकी हुई थी।तभी पार्थ की साईकिल किसी से टकराई।"देख कर नहीं चल सकते"एक प्यार भरी आवाज पार्थ को सुनाई दी।पार्थ जब तक कुछ जवाब देता,तभी उसके सामने गुलाबी गालों पर गुस्सा लिए एक लड़की खड़ी थी।पार्थ कुछ बोलने की अवस्था में नहीं था।वो देख रहा था चश्में में दिखने वाली दो बड़ी आंखों और इतनी सर्दी में भी खुले बालों वाली लड़की को।बालों की खुशबू को सूंघ पार्थ ने बेशर्म होकर पूछा, क्लिनिक प्लस ना। लड़की बोली ,"क्या?"।"अरे क्लिनिक प्लस सैंपू से बाल धोएं हैं ना" पार्थ ने बोला। लड़की ने नजरों को झुकाते हुए हामी में सिर हिलाया। पार्थ बोला "मुझे बहुत पसंद है, इसकी खुशबू। लड़की जो गुस्से से लाल थी,अब मुस्करा रही थी।"हाय , आई एम पार्थ ठाकुर "पार्थ ने लड़की की तरफ हाथ बढ़ाकर बोला।ये छोटे शहर के लड़को की खासियत होती है, कि वो लड़की के सामने अंग्रेजी जरूर बोलते हैं।शायद उन्हें ये कूल लगता है।"हाय, आई एम प्रार्थना यादव" प्रार्थना ने उत्तर दिया।उसके बाद दोनो ने एक दूसरे को सॉरी बोला और अपने अपने रास्ते निकल गए।सच में,किसी से टकराना कभी कभी हमें उस शख्स से ऐसे मिला देता है।जैसे राही को रास्ते मिलाते हैं,मंजिल से।

   सुबह साइकिल की टक्कर होने के कारण आज स्कूल के बाद पार्थ फिजिक्स की ट्यूशन पैदल ही गया था।शहर के प्रतिष्ठित अध्यापक होने के कारण उपाध्याय जी पर संपूर्ण शहर के स्कूल के बच्चे आते थे।सच बताएं तो फिजिक्स की ट्यूशन में बच्चों की केमिस्ट्री अच्छी हो जाती थी।पार्थ आज पैदल आने की वजह से थोड़ा लेट हो गया था।इस लिए वो उपाध्याय जी की ट्यूशन के दरवाजे पर बैठ गया था।उपाध्याय जी वैसे तो लड़के और लड़कियों में कोई भेद नहीं करते थे।लेकिन हां वो अपनी ट्यूशन में लड़कियों को सदैव आगे बैठाते थे। उपाध्याय जी बता रहे थे," जब भी किसी चालक को फ्लक्स या फ्लक्स को कोई चालक काटता है तो विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।" तभी पार्थ चिल्लाया ,"काट दिया"। सब लोग पार्थ की तरफ देख रहे थे।उपदेशिका जिसने आज आज ही शाम के बैच में ज्वाइन किया था। दरवाजे से एंट्री मारी और उसका पैर पार्थ के पर पर रख गया। सॉरी पार्थ ,बोलकर वो आगे जाकर बैठ गई।उपाध्याय जी ने क्लास को मुद्दे से भटकाते हुए बोला," दरवाजे पर बैठोगे तो इसरो में चौकीदार बनोगे,थोड़ा अंदर बैठोगे तो शायद कुछ भला हो जाए।तभी पीछे सी आवाज आयी,"सर फिर तो ये प्रधानमंत्री भी बन सकता है।पूरी क्लास और उपाध्याय जी हंस रहे थे।परंतु पार्थ,देख रहा था प्रार्थना को।जैसे बच्चे देखते हैं,आसमान में इंद्रधनुष को।

शाम के छः बज चुके थे।उपाध्याय जी के ट्यूशन की छुट्टी हो चुकी थी।सभी विद्यार्थी अपनी अपनी साइकिल से निकल चुके थे।पार्थ भी पैदल अपने घर की ओर जा रहा था।तभी प्रार्थना की आवाज आई,"पार्थ,रुको यार"। वैसे लड़कियों के इस "यार" शब्द ने ,ना जाने छोटे कस्बों के कितने लड़कों को प्यार में पागल बनाया। उत्तर भारत में सर्दी से भरी शामें हल्के कोहरे की वजह से धुंधली हो जाती हैं। ये धुंधली शाम अक्सर दो प्रेम करने वालों के लिए एक नए सवेरे सी होती हैं। पार्थ अब चल रहा था,अकेला नहीं, प्रार्थना के साथ में।"वैसे क्या प्लान है तुम्हारा ,ट्वेल्थ के बाद"प्रार्थना ने पार्थ से पूछा।                 पार्थ ने कहा," यार वैसे सपना तो आर्मी में जाना है।लेकिन फिलहाल तो ट्वेल्थ में अच्छे मार्क्स लाना है"।प्रार्थना ने कहा,"यार मार्क्स तो मुझे भी अच्छे लाने हैं लेकिन ट्वेल्थ में नहीं नीट में।पार्थ ने पूछा,"अरे तुम बायोलॉजी से हो क्या"। "क्यों कोई शक है क्या,"प्रार्थना ने कहा।पार्थ बोला मुझे लगा कि शायद तुम गणित में हो। "गणित में तो नहीं लेकिन हां पार्थ बाबू ,तुम्हारे ही कॉलेज में हूं वैसे मैं" प्रार्थना ने उत्तर दिया। तब तक तिराह आ चुका था।जहां से उन दोनो के घर के रास्ते अलग अलग थे। सच बताऊं तो कभी कभी लगता है।जो परिस्थियों से हार नहीं मानता उसके लिए "हार" उलट कर खुद "राह"बन जाती है।

छोटे कस्बों में सर्दियों की सुबहों में साईकिल की घंटियों की आवाजें ,चिड़ियों की आवाजों से ज्यादा होती हैं। ब्रेड,बथुआ,साग,मैथी को बेचने वाले, सर्दी को एहसास कराते हैं कि पेट की आग के आगे आज भी वो तुच्छ और निरीह है।विद्यार्थी भी सर्दी की आंखों में आंखें डालकर उससे कहते हैं कि वो सिर्फ परीक्षा के पेपर को ही देख कर कांपते हैं।लेकिन आज सर्दी इतनी तेज थी की पार्थ अपनी साइकिल के हैंडल को छोड़कर,अपने दोनो हाथ अपनी जैकेट की जेब में डालकर कोचिंग को आ रहा था।थोड़े दिन ही बचे थे बोर्ड के पेपर में, इस लिए प्रार्थना भी आज सुबह वाले बैच में रिवीजन करने के लिए ट्यूशन आई थी।गुप्ता जी केमिस्ट्री के बहुत ही पुराने अध्यापक थे।उन्हे केमिस्ट्री ऐसे आती थी जैसे हमें फिल्मी गाने आते हैं।आज पीरियोडिक टेबल का रिवीजन होना था। बच्चों की भीड़ बैठने के बाद भी पार्थ और प्रार्थना दोनो के बीच इतनी दूरी थी।जितनी दूरी ये समाज अक्सर छोड़ देता है।लड़के और लड़कियों के बीच में।चाहे वो स्कूल की सीटों के बीच हो या किसी सरकारी दफ्तर में लगी लाइनों के बीच।लेकिन अब पार्थ और प्रार्थना इस दूरी को कम कर पास आ रहे थे।जैसे लहरें किनारों के करीब आती हैं।तभी गुप्ता जी बोले," पीरियोडिक टेबल में s ब्लॉक के ग्रुप को याद करने के लिए "Hari lal nana Kal Raat car se farar ", अर्थात हाइड्रोजन(H),लिथियम(Li) ,सोडियम (Na), पौटेशियम (K), रूबीडीम(Rb),सेसियम (Cs), फ्रैंशियम (fr)। इन्हें एलकाली मेटल भी कहते हैं। सभी बच्चे इस ट्रिक से खुश थे।लेकिन पार्थ अपने हाथ के दास्तानों को उतार कर ,प्रार्थना के हाथों को थाम ऊष्मा स्थानांतरण का प्रयोग कर रहा था।केमिस्ट्री की टयूशन में बच्चे अक्सर फिजिक्स का रिवीजन कर लेते थे।

सुबह का वक्त था।कोहरे को चीरती हुई आवाज आई,"जे लौंडे जो लफंगियाई करत रहे हैं,अब समझ आईए इन्हें। 5 दिन बाद इनके पेपर जो हैं"।पार्थ ने देखा सामने वाले मेहता अंकल जो उसके ही स्कूल में कला पढ़ाते थे।ये बोलते हुए ,पार्थ के बाबा के पास आकर तापने लग गए।पार्थ ने मन में बड़बड़ाया,"इनकी तो पहले से ही जली रहती है,फिर क्यों ताप रहे हैं।पार्थ उनके ताने से बचने के लिए अपने कमरे में चला गया।सुबह के 9 बजे थे।स्कूल के प्रांगण में पार्थ ,प्रार्थना को खोज रहा था।तभी पीछे से ,प्रार्थना ने अपने ठंडे हाथों से पार्थ की आंखे बंद कर लीं।पार्थ ने प्रार्थना के हाथों को हटाते हुए बोला,"यार वो मेहता देख लिया तो मोहल्ले में बवाल करवा देगा"।तभी प्रधानाध्यापक चौधरी जी ने अनाउंस किया," आज हाफ डे के बाद 10 वीं और 12 वी कक्षा के विद्यार्थी अपना प्रवेश पत्र ले लें।कल से इन लोगों की क्लासें नहीं लगेंगी।वो अब घर से ही रिवीजन करके पेपर देने जाएं। बारहवीं के सभी विद्यार्थियों के चेहरे ही उतर गए थे।वो स्कूल जिसके मान सम्मान के लिए वो शहर के अन्य प्राइवेट स्कूल के बच्चों से लड़ जाते थे। उस स्कूल ने उन्हे पराया कर दिया था। लड़के और लड़कियों का परीक्षा का सेंटर अलग अलग था।इसलिए अब इन सभी का दोबारा मिलना भी नामुमकिन सा था।सब एक दूसरे को जी भरके देख रहे थे। उस दिन,वो सब एक साथ आखिरी बार मिल रहे थे।आंखों में नमी लिए प्रार्थना ने पार्थ से पूछा," फिर कब मिलेंगे?। पार्थ ने उसको ढांढस बंधाते हुए कहा,"पागल अभी पेपर शुरू होंगे,खत्म होंगे और तेरा पीछा तो मैं कभी ना छोड़ूं मेरी भूतनी"।प्रार्थना हंस कर बोली,"05688-....... ये मेरे घर का लैंडलाइन नंबर है,अब तू यहीं से मुझ पर लाइन मारना।पार्थ ने "क्लीनिक प्लस " के नाम से प्रार्थना का नंबर सेव कर लिया था।

 मार्च महीने का पहला दिन था।हल्की सर्दी और तेज धूप के साथ मौसम सुहाना प्रतीत हो रहा था। यूपी बोर्ड्स की परीक्षाए आज हिन्दी विषय की परीक्षा के साथ शुरू हो रही थीं।तभी पार्थ का मोबाइल बजा।पार्थ बिना स्क्रीन देखे मोबाइल को सीधे कान से लगाकर बोला,"हेलो कौन?"।"अच्छा अभी से भूल गए, वाह पार्थ वाह",प्रार्थना ने तपाक से बोला। पार्थ ने उदास होते हुए कहा,"नहीं यार बस ये हिंदी के पेपर का डर है।सुन,ये हिन्दी बिल्कुल हमारी मम्मी जैसी है। प्यारी तो बहुत है, लेकिन समझ नहीं आती। चल ये छोड़, ये बता तूने क्यों फ़ोन किया"।प्रार्थना ने परेशान होते हुए कहा,"यार , करुण रस और वियोग रस में समझ नहीं आ रहा।दोनो के उदाहरण एक जैसे ही हैं। इनमें अंतर कैसे करूं"।पार्थ ने कहां," देख करुण रस में बंदे का खेल हो जाता है,मतलब वो अपने शरीर को त्याग देता है। जबकि वियोग रस में दो प्रेम करने वाले सिर्फ अलग होते हैं और दोनो जिंदा होते हैं। जैसे : रावण का मेघनाद की मृत्यु पर रोना करुण रस का उदाहरण है और प्रभु राम का सीता जी की के हरण के बाद विलाप करना वियोग रस है। वियोग मतलब दोबारा योग हो सकने की परिस्थिति"।"मतलब मैं अभी वियोग रस से पीड़ित हूं"प्रार्थना ने कहा। पार्थ हंसते हुए बोला,"तू हास्य रस का उदाहरण है पागल।चल अब बाय ,पढ़ने दे"। प्रार्थना ने गुस्सा में कहा ,"ठीक है, बाय।

बारहवी के सभी पेपर होने के बाद पार्थ बहुत परेशान रहता।प्रार्थना से मिलने का कोई एक बहाना भी उसके लिए किसी उपलब्धि जैसा होता था।सोमवार का दिन था।पार्थ ने प्रार्थना को कॉल किया।तीन बार फोन लगाने पर भी किसी ने नहीं उठाया।पार्थ परेशान था इस लिए वो मोबाइल चलाने लगा।तभी उसके मोबाइल पर "27 अप्रैल को जारी होगा 12 वीं का परिणाम" ये नोटिफिकेशन आया।पार्थ पहले तो खुश हुआ,लेकिन जब उसे याद आया कि उसका केमिस्ट्री का पेपर अच्छा नहीं हुआ था।इस वजह से वो उदास हो गया।पार्थ ने कैलेंडर में देखा तो पाया सिर्फ दो दिन बाकी हैं रिजल्ट आने में। उसने तभी घर के बाहर से उसके बाबा को बोलते हुए। मेहता अंकल की आवाज "ठाकुर साहब रिजल्ट आयवे वालो है परसों बारहवीं को,सोच लेओ आगे का कराने है जा छोकरे को" सुनी।तभी पार्थ तिलमिला उठा।घर से बाहर आकर बोला,"अंकल सुनो हम बीटेक तो करियें ना,का है मोहल्ला में बहुत बेरोजगार वैसे ही भरे हैं"।मेहता जी के बीटेक किए हुए बड़े लड़के अर्थव मेहता की नाकामी को अपना हथियार बनाकर पार्थ खुश था।लेकिन उसने तभी देखा अर्थव ने ये सुन लिया था।पार्थ की ये खुशी उदासी में बदल गई।अर्थव भैया,मोहल्ले के वो बड़े भैया थे जिनका उदाहरण प्रत्येक घर में दिया जाता था।उनकी कामयाबी के लिए नहीं, बल्कि उनकी नाकामयाबी के लिए।

सच बात ये थी कि अर्थव का मन पढ़ाई से ज्यादा कविताओं और कहानियों में लगता था। उसकी कई कविताएं दैनिक अखबारों में छप चुकी थीं।लेकिन मेहता जी का मानना था।ये सिर्फ शौक के लिए अच्छा है लेकिन शौक पूरे करने के लिए किसी नौकरी का होना आवश्यक है। पार्थ उदास था।अर्थव भैया के विषय में ऐसा बोलना। उसे ग्लानि से भर रहा था।तभी उसका फोन बजा।मोबाइल पर "क्लीनिक प्लस वाली" लिख कर आ रहा था।पार्थ ने फोन उठाते हुए बोला,"कहां व्यस्त थी मैडम?"। प्रार्थना ने कहा,"वो आज नीट का पेपर था यार, वही देने गई थी।

पार्थ की आवाज से उदासी को भांप कर प्रार्थना ने उस से इसकी वजह पूंछी।पार्थ ने थोड़ी ही देर पहले हुआ वाकया प्रार्थना को सुनाया।"तुझे अर्थव भैया से माफी मांगनी चाहिए,पार्थ"प्रार्थना ने पार्थ से कहा।"ठीक है,मैं अभी जाता हूं,शायद वो मुझे मांग कर देंगे।आखिर बड़े भैया हैं। चल बॉय पागल"।"गलती का एहसास होना हमें माफी के काबिल बनाता है पार्थ, ठीक है, बॉय पगले" प्रार्थना ने कहा।पार्थ अर्थव भैया के घर की ओर चल दिया।

आज पूरे सात साल बाद पार्थ,मेहता अंकल के घर गया था।पार्थ को आज भी याद है जब मेहता अंकल ने शक लक बूम बूम देखते हुए पार्थ को अपने घर से भगा दिया था। ये बात तो है,बचपन में हुई बेज्जती,जवानी में मिले प्यार के धोखे से ज्यादा घाव देती है।पार्थ,अर्थव भैया के रूम के बाहर जाकर खड़ा हो गया था। अर्थव ने जब उदास पार्थ को अपने कमरे के बाहर खड़ा देखा तो उसे अन्दर आने का इशारा किया। पार्थ अपनी नजरों को झुकाए खामोश खड़ा था। अर्थव ने बोला,"क्या बात है पार्थ,आज तू हमारे घर पर कैसे"।"भैया वो सुबह मैं ज्यादा ही बोल दिया। मैंने सोचा ही नहीं की आपको कितना बुरा लगेगा" पार्थ ने अर्थव से कहा।अर्थव ने पार्थ की ग्लानि से भरी आवाज को भांपते हुए कहा,"पार्थ आज तुझे अपनी स्टोरी बताता हूं। जब मैं 10 वी में था तो मैंने पूरा जिला टॉप किया था।उसके बाद 11 वी में पापा ने खुश होकर मुझे मोबाइल दिला दिया और मेरा, वो कस्बे के सबसे महंगे वाले कॉलेज में प्रवेश करवाया।11 वीं के पहले ही दिन मुझसे स्कूल में एक लड़की टकराई थी।टकराने के बाद उसकी अकार्बनिक रसायन विज्ञान की किताब मेरी उंगली पर गिर गई थी। मेरी उंगली को फूंकते हुए वो इतना चिंतित थी,जितना चिंतित हम किसी अपने के लिए होते हैं।पूरी बारहवीं उसके साथ बीती।कभी लगा ही नहीं कि हम कभी अंजान थे। फिर उसका दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया।और मैं बिना प्लान के जी रहा था।घर वालों ने बीटेक करवाई लेकिन प्राइवेट जॉब नहीं करने दी। अब बस ये ,कलम घिस रहे हैं। शायद मेरे किस्मत की चिंगारी प्रज्जवलित हो जाए"।पार्थ समझ नहीं पा रहा था कैसे अर्थव भैया मेधावी छात्र होकर भी ,अपनी ही ख्वाहिशों के पात्र ना थे

पार्थ जब मेहता अंकल के घर से लौटा तो रात हो चुकी थी।

अर्थव भैया की प्रेम कहानी उसे लगभग अपनी सी लगी। पार्थ मन ही मन सोच रहा था। क्या सच में ,जिस से हम बेइंतहा प्रेम करते हैं वो एक दिन हमें भूल जाता है।जैसे मुसाफ़िर रास्ते भूल जाते हैं। उसने तभी प्रार्थना को कॉल किया। प्रार्थना की दादी ने फोन उठाकर पूछा,"हेलो,कौन"।

पार्थ ने खामोश रहकर फोन के कटने का इंतजार किया।एक बार और फोन बजा तो प्रार्थना ने फ़ोन उठाते हुए बोला,"हेलो,जी कौन"।"कल मंदिर पर मिलते हैं यार,"पार्थ ने कहा।प्रार्थना ने हामी भरते हुए शाम को मिलने के लिए कहा।"अरे! कौन है फ़ोन पर प्रार्थना,"दादी ने कमरे से आवाज़ देते हुए प्रार्थना से पूछा।"जी दादी कोई नहीं है",प्रार्थना ने उत्तर देते हुए कहा। झूठ बोलती लडकियां,अक्सर समझदार हो जाती हैं।

सोमवार का दिन था।अप्रैल का महीना गर्मियों के आगमन और सर्दियों गमन का मेल जोल होता है।इस लिए इस महीने दिन और रात लगभग बराबर होते हैं।मंदिर के पास वाले बरगद के पेड़ के नीचे पार्थ बैठा हुआ था।तभी प्रार्थना ने मंदिर में प्रवेश की।पार्थ को देखे बिना सबसे पहले वो मंदिर के बैठे प्रेम के मानक,प्रभु श्री राम के चरण स्पर्श करती है।पंडित जी,जो प्रार्थना को तबसे जानते हैं।जब वो अपनी दादी के साथ पहली बार मंदिर आई थी।"लो बिटिया प्रसाद लो और खूब तरक्की करो" पंडित जी ने कहा।

 प्रसाद लेकर प्रार्थना पास वाले बरगद के पेड़ के नीचे बैठे पार्थ को प्रसाद देती है।"तो क्या हाल है,पागल लड़के",प्रार्थना ने पार्थ से पूछा।पार्थ ने धीमी आवाज में पूछा,"क्या हम भी अलग हो जायेंगे अब"। प्रार्थना ने पार्थ की भावनाओं को भांपते हुए बोला,"हमारा साथ होना और अलग होना सब नियत है पार्थ,बस हम इतना जरूर कर सकते हैं। कि इस हसीन वक्त को बिना अफसोस और शोक के खुशी खुशी बताएं। "अच्छा ,तो जो वादे हमने किए वो सब निराधार है क्या प्रार्थना",पार्थ ने पूछा।"पार्थ , हमें समझना होगा कि जीवन बचपन नहीं है जो पॉकेट मनी से चल जायेगा।इसको चलाने के लिए तनख्वाह ऐसे जरूरी है जैसे जीने के लिए सांस।यार हम अभी पढ़ेंगे,इतना कि हम अपनी जिम्मेदारियों का बोझ उठा सकें।अगर उसके बाद भी हम में प्रेम शेष रहता है तो हम विवाह करेंगे"प्रार्थना ने कहा।प्रार्थना को इतना समझदार होता देख पार्थ समझ गया था कि प्रेम तभी हकीकत में तब्दील हो पाता है।जब सपनो को हकीकत बनाया जाए। दोनो लोग मंदिर से घर की ओर निकल पड़े।रास्ते में मोमोज की दुकान पर पार्थ ने फ्राई मोमोज को छोड़कर। प्रार्थना की पसंद वाले, भाप वाले मोमोज खाए।किसी की पसंद का ख्याल रखना , उस से प्रेम करने की हमारी उत्सुकता को बढ़ता है। प्रार्थना ये सब देख रही थी और सोच रही थी, सच में प्रेम ,लड़कपन को जिम्मेदारियों में बदल देता है।

सुबह के छः बज चुके थे।पार्थ आज जल्दी उठ गया था।आज 27 अप्रैल को उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का परिणाम आने वाला था। बारहवीं की परीक्षाओं के बाद ये पहला दिन था जब पार्थ ने इतनी जल्दी उठ कर नहा लिया था। पार्थ का भविष्य आज के दिन पर निर्भर था।आज पार्थ बिल्कुल आदर्श बालक की तरह कार्य कर रहा था। उधर प्रार्थना भी आज सुबह जल्दी उठ कर अपनी दादी के कार्यों में हाथ बंटा रही थी। इन सब कामों में पार्थ इतना व्यस्त था कि उसे पता भी नहीं चला कब 12 बज चुके थे। तभी मेहता अंकल अपना सैमसंग का नया वाला फोन पार्थ के बाबा को दिखाते हुए बोले,"का ठाकुर साहब आज बो तुमायो नाती दिखाई नहीं दे रहो।देखो बाको परीक्षा को परिणाम भी आए गयो। अपने विद्यालय में सेकंड टॉप करो है अपने छोकरे ने"।आज ये शायद पहली बार था जब पार्थ ने मेहता अंकल के मुंह से पार्थ के लिए अपना शब्द सुना था।तभी पार्थ का फोन बजा।"ओय पागल तू तो टॉप ही मार दिया",प्रार्थना ने बोला।पार्थ ने प्रार्थना से पूछा ,"मेरी छोड़ तू बता तेरे कितने प्रतिशत बने"। "कहा था ना तेरा साथ नहीं छोडूंगी, फर्स्ट टॉपर हूं मैं भी"प्रार्थना ने कहा। कभी कभी किसी का हम से आगे निकल जाना हमें दुख से ज्यादा खुशी देता है।आज पार्थ खुश था। अपने लिए भी और उस से ज्यादा प्रार्थना के लिए।

शाम का समय था। तभी मोहल्ले में मीडिया वाले आ गए।मेहता अंकल से उन्होंने पुछा ,"ठाकुर साहब का घर कौन सा है"।मेहता जी उन्हें ठाकुर साहब के घर के पास ले जाते हैं।तभी पीछे से आवाज आती है,"ठाकुर साहब के घर के सामने ही है। अर्थव मेहता जी का घर।सभी लोग मेहता जी के दरवाजे पर भीड़ लगा लेते हैं।मेहता जी मीडिया वालों से अर्थव का नाम सुन परेशान हो जाते हैं। "अब क्या कर दिया इस बेरोजगार अर्थव ने," बोलते हुए वो घर के अंदर घुसते हैं। "बेरोजगार नहीं भाईसाहब बेस्टसेलर उपन्यासकार बोलिए"पत्रकारों की भीड से आवाज आई। तभी अर्थव घर से बाहर आया और उसने मीडिया द्वारा इंटरव्यू लेने वाली सीटों पर पहले मेहता जी को बैठाया।उनके ही पास वो खुद बैठ गया। "अर्थव जी आपको आपके उपन्यास "बेरोजगार प्यार" के लिए बधाई।लेकिन मेरा प्रश्न आपके पिता से है कि वो आज कैसा महसूस कर रहे हैं"। मेहता जी स्कूल की स्टेज पर भी जानें से डरते थे।आज पत्रकारों को देख आवाक थे।लेकिन उन्होंने माइक को पकड़ते हुए बोला,"आज जिसे आप अर्थव मेहता बोल रहे हो ।वो मेरे लिऐ सदैव एक नाकारा रहा। मैंने कभी कोशिश नहीं की इसे समझने की। अपने सारे सपने इस पर थोपे।लेकिन ये भी महान ही था।इसने कभी विरोध ही नहीं किया और मेरे थोपे हुए सपनो को पूरा करने के चक्कर में भूल गया कि इसके भी कुछ सपने हैं।लेकिन मैं आज खुश हूं कि इसने अपने सपनो को बुलंदियां दीं"।अर्थव की आंखें नम हो गईं थीं।पार्थ भी आज हमेशा मुस्कराते मेहता जी को गर्व और ग्लानि दोनो से परिपूर्ण देख रहा था।मेहता अंकल तभी बोले," इंटरव्यू आप लीजिए।हम आप सभी के नाश्ते का प्रबंध करते हैं"।कुछ ही देर बाद मेहता जी समोसे ,कोल्डड्रिंक और गोंद के लड्डू सभी में बंटवाने लगे।अर्थव भैया ने पार्थ के पास आकर उसे चार लड्डू और उसका बजता हुआ फोन देते हुए कहा,"क्लिनिक प्लस वाली के लिए भी रख ले"।

पार्थ के कंधे पर हाथ रखकर अर्थव भैया बोले,"प्रेम करना,लेकिन मोह ना करना"। क्योंकि किसी मोह हमें हमारे सपनो से अलग कर देता है। आज पार्थ पहली बार जीवन में बड़े भाई की अहमियत को समझा था।

बोर्ड के परिणाम आने के बाद कॉलेज वालों ने मेधावी बच्चों को अगले दिन स्कूल बुलाया था।सुबह सुबह पार्थ प्रार्थना से स्कूल के बाहर वाल,नीम के पेड़ की नीचे मिलता है। पार्थ उसे अर्थव भैया द्वारा दिए गोंद के लड्डू देकर, परीक्षा में अव्वल आने की बधाई देता है।प्रार्थना भी अपने मिल्टन वाले टिफिन से "गाजर का हलवा " पार्थ को थमाती है।"तुझे पता है,ये सिर्फ मैंने बनाया है। दादी से पूछ पूछ कर",प्रार्थना कहती है। आज गाजर के हलवे में कम शक्कर,प्रार्थना के प्रेम की मिठास के आगे फीकी थी। पार्थ और प्रार्थना दोनों एकटक एक दूसरे को देख रहे थे।कुछ रिश्तों में रिश्ते का होना जरूरी नहीं होता। इस चीज का एहसास हमें तब होता है। जब कोई पराया हमारी अपनो से भी ज्यादा मदद करता है। "चलिए पार्थ भैया,प्रधानाध्यापक साहब बुला रहे हैं,"स्कूल के लिए चपरासी और बच्चों के मनु भैया ने पार्थ से आकर बोला। "चलों मनु भैया,आज तो मामा ठाकुर ने हवेली पर बुलाया है,"पार्थ ने कहा।प्रधानाध्यापक के उपनाम को सुन प्रार्थना , मनु भैया और पार्थ जोरों से हंसने लगे।

चौधरी साहब जो एक कड़क प्रधानाध्यापक थे आज बिलकुल नरम मिजाज के लग रहे थे।प्रार्थना के सिर पर हाथ रखते हुए बोले,"बेटी आज तुमने स्कूल में अव्वल आकर मेरे स्वर्गीय पत्नी की इच्छा पूर्ण कर दी।हमने जब ये स्कूल साथ खोला था तो वो मुझसे हमेशा कहती थी।देखना चौधरी साहब एक दिन कोई लड़की हमारे इस स्कूल का नाम रोशन करेगी"। आज मामा ठाकुर के अंदर,ये परिवर्तन देख पार्थ,मनु भैया और प्रार्थना की आंखें नम हो गईं थीं।दोनो लोगों को चौधरी साहब ने पुरुस्कार और भविष्य की शुभकामनाएं देकर स्कूल से विदा किया।रास्ते में चलते हुए।पार्थ प्रार्थना से बोला,"सच में यार अगर प्रेम पानी की तरह पवित्र और निरंतर किया जाए तो पत्थर भी अपना आकार बदल लेता है"।

क्लीनिक प्लस वाली" पार्ट-15

जून का महीना था। गर्मी अपने चरम पर थी।पार्थ और प्रार्थना को मिले एक महीना हो चुका था।पार्थ,प्रयागराज में भारतीय सेना की "टेक्निकल एंट्री स्कीम (TES)" का साक्षात्कार देने गया था।इधर आज प्रार्थना का भी नीट का रिजल्ट आने वाला था।आज पार्थ और प्रार्थना दोनो के लिए महत्वपूर्ण दिन था।लेकिन दोनो एक दूसरे से मीलों दूर थे।प्रयागराज जंक्शन से आर्मी की बस ने सभी आगुंतको को छावनी तक पहुंचाया।सभी कैडेट को सुबह का नाश्ता मिला।आज से इंटरव्यू शुरू हो रहे थे।सभी कैडेटों को "पिक्चर परसेप्शन डिस्क्रप्शन राउंड " के लिए बुलाया गया।सभी कैडेट एक एक करके अंदर जा रहे थे। पार्थ का नंबर आ चुका था।पार्थ ने रूम के दरवाजे को खोलते हुए अंदर आने की परमिशन मांगते हुए बोला,"May I Come in Sir" ।अंदर बैठे इंटरव्यू पैनल के सदस्य ने पार्थ कोबैठने का इशारा कर, तस्वीर दिखाते हुए पूछा,"पार्थ,तुम्हारे इस तस्वीर को लेकर क्या विचार हैं"।रानी लक्ष्मीबाई की अपने घोड़े के साथ खाई से कूदते वक्त की तस्वीर को देख पार्थ बोलता है," सर जीवन में व्यक्ति मौत और शहादत दोनो में से एक ही को पा पाता है। चूंकि वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई मौत से ज्यादा शहादत को पसंद करती थीं इस लिए उन्होंने ये राह चुनी।दूसरा तथ्य है कि रानी जी की इस छलांग में जीवन की एक नई उम्मीद भी छिपी हुई थी अर्थात दुश्मन के हाथों से मौत पाने से बेहतर है। अंत समय में अपनी आखिरी कोशिश करते हुए भी दुश्मन को अचंभित कर देना।वो आखिरी कोशिश या जीवन लाएगी या शहादत"। पैनल में बैठे कर्नल यादव जी ने पार्थ से कहा,"तुम कहानियां अच्छी बनाते हो लेकिन अफसोस हमें कहानीकार नहीं एक फौजी की जरूरत है। जो कहानी नहीं इतिहास रचे"।कर्नल यादव की बात पार्थ को चुभ गई थी।पार्थ पहले ही राउंड में असफल हो गया था।छावनी से प्रयागराज कैंट तक सेना के वाहन से रास्ता एक दम असली फौजी वाली जिंदगी का अहसास करा रहा था।तभी सड़क पर से पार्थ को फौजी समझ एक बच्चे से सैल्यूट किया।पार्थ ने नम आंखों के साथ उस बच्चे को सैल्यूट किया।आज पूरी तरह टूट चुके पार्थ के जीवन में उस बच्चे के सैल्यूट ने एक उत्प्रेरक का काम किया था। सच में डूबते को तिनके का सहारा ही बचा लेेता है।

पार्थ ,प्रयागराज से अपने कस्बे वापस आ चुका। उस बच्चे की सलामी ने उसकी ख्वाहिश को नीलाम होने से बचा लिया था।तभी पार्थ का फोन बजा।पार्थ ने फोन को कान से लगाते हुए बोला,"बोल प्रार्थना क्या हाल हैं"। "यार मेरा नीट में हो गया,मेरी ऑल इंडिया रैंक 30 आई है,"प्रार्थना ने बोला। "Congrats यार", पार्थ ने उत्तर दिया।प्रार्थना ने पार्थ की उदासी से भरी आवाज को भांपते हुए पूछा,"क्या बात है पार्थ, तू उदास क्यों है"।पार्थ ने शाम को मंदिर पर मिलने को कहा।शाम के लगभग 7 बज चुके थे।मंदिर की आरती होने के बाद पार्थ और प्रार्थना दोनो वहीं पास वाले बरगद के पेड़ के किनारे मिले।सिर्फ एक महीने की दूरी उन्हें वर्षों सी प्रतीत हो रही थी। प्रार्थना ने पार्थ के हाथ को थामते हुए पूछा ," क्या हुआ पार्थ,उदास क्यों है"। पार्थ ने उसे इंटरव्यू में हुई सारी घटना बता दी।प्रार्थना ने पार्थ से कहा ,"क्या हुआ इतना परेशान क्यों है।अभी तो तू ग्रेजुएशन के बाद CDS भी दे सकता है और अभी बहुत मौके हैं"।पार्थ ने थोड़ा मुस्कराते हुए प्रार्थना से पूछा ,"अच्छा बताओ फिर तुम्हारी काउंसिलिंग कब है"।

"बस 2 दिन में है,उम्मीद है दिल्ली एम्स मिल जायेगा",प्रार्थना ने कहा।

पार्थ ने अपने हाथ में  प्रार्थना की हथेलियाँ लेते हुए पूछा, "डॉक्टर साहिबा, तुम मुझे भूलोगी तो नहीं"।

"वैसे तो नहीं भूलूंगी। लेकिन हां अगर कोई सरकारी नौकरी वाला मिल गया तो सोचना पड़ेगा"प्रार्थना ने हंसते हुए कहा।पार्थ ने प्रार्थना से नाराज होते हुए बोला,"चल हट पगली। सच में प्रार्थना ,सरकारी नौकरी का अपने समाज में बहुत महत्व है।बेरोजगारी के वक्त जिस लड़के का नाम परिवार के किसी शादी के कार्ड पर दर्शनाभिलाषी वालों में लिखा रहता है।वही लड़के का नाम सरकारी नौकरी के बाद स्वागतकर्ताओं में  उसके पद के साथ शामिल हो जाता है"। 

पार्थ की बातों की गहराइयों को समझ प्रार्थना सोच रही थी।सच में पार्थ बदल गया है।वो कुछ महीनों पहले ऐसे पार्थ से मिली थी जो अपनी ही धुन में मस्त और मग्न रहता था। प्रेम और जिम्मेदारियां दोनो एक दूसरे के पूरक है।जब भी हमें इनका एहसास होता है हम खुद ब खुद जिम्मेदार हो जाते हैं।जैसे पार्थ ठाकुर हो रहा था।

मन्दिर से दोनो लोग अपने अपने घर की ओर चलने लगे।शाम के अंधेरे में भी इतना उजाला होता है कि हम साथ चल रहे लोगों को जी भर कर देख सकें। इसी उजाले में पार्थ देख रहा था प्रार्थना को।तभी पार्थ का फोन बजा,मेहता जी का फोन था।"पार्थ घर आ जाओ, ठाकुर साहब की  तबियत ज्यादा खराब है",मेहता जी ने फोन पर बोला।पार्थ ने प्रार्थना से कहा ,"यार बाबा की तबियत खराब  है। मैं घर जा रहा हूं।फिर मिलते हैं।पार्थ दौड़ते हुए अपने घर पहुंचा।दादा जी को लेकर मेहता जी,अर्थव भैया और पार्थ शहर के हॉस्पिटल पहुंचे।डॉक्टर साहब ने पार्थ के दादा की जांच करने के बाद बताया,"इनको कैंसर है और इनका बचना नामुमकिन है"। 

डॉक्टर की बात सुनकर पार्थ रोने लगा।मेहता अंकल में पार्थ को समझाया और दादा को घर ले आएं।शाम का खाना मेहता जी ने पार्थ के घर भिजवा दिया।छोटे कस्बों में आज भी बड़े दिल वाले पड़ोसी रहते हैं।रात गर्मी से पसीने छोड़ रही थी। मच्छर रातों का खून चूस कर उन्हें सुबह करने की तैयारी में थे।आज पार्थ जल्दी उठ गया था।उसने बाबा के लिए चाय बनाई और उन्हें देने गया।"बाबा लेओ चाय पीलो",पार्थ ने कहा। बाबा ने चाय को हाथ में ले कर पार्थ से ब्रेड मांगा।पार्थ ब्रेड लेने अपनी रसोई में चला गया। तभी अचानक गिलास के गिरने की आवाज आई।पार्थ गिलास की आवाज के पीछे दौड़ा। सामने पार्थ के बाबा चारपाई पर लेटे थे और गिलास जमीन पर डला हुआ था।पार्थ ने गिलास को उठाते हुए बाबा से कहा," क्या हुआ शक्कर कम हो गई क्या"। बाबा ने कोई जवाब नही दिया।बाबा पार्थ को एक टक देख रहे थे।बाबा की आंखों के किनारे से आंसू की दो बूंद थी।पार्थ ने बाबा को पकड़ कर पूछा बाबा ,"आप क्यों रो रहे हो"।बाबा फिर से खामोश थे।इस खामोशी का मतलब पार्थ समझ गया था।आज पार्थ दूसरी बार अनाथ हुआ था।बचपन में मां बाप के गुजर जाने का पार्थ को कभी दुख ना था।क्योंकि तब वो अबोध था।लेकिन आज बाबा के जाने से वो बिल्कुल टूट गया था।पार्थ ने रोते हुए मेहता अंकल जी को बुलाया।पार्थ के चाचा को भी बुलाया गया।शाम तक ठाकुर साहब को श्मशान में दाग देकर ।पार्थ को उसके चाचा अपने साथ लेकर देहरादून चले गए।देहरादून भारत की राजधानी दिल्ली से उत्तर की ओर बसा एक सुकून भरा शहर है।पार्थ के चाचा 12 वीं के बाद आगे ना पढ़ने की वजह से यहां अपने फूफा के साथ भाग आए थे। फूफा जी के ही सहारे पार्थ के चाचा ने देहरादून के पलटन बाजार में साड़ियों की एक दुकान की थी।तब से पार्थ के चाचा देहरादून के ही हो गए।अब पार्थ को अपने चाचा के साथ दुकान पर बैठना पड़ता।एक दिन एक हट्टा खट्टा लड़का,पार्थ की दुकान पर आया।"भाई कोई साड़ी दिखाओ।अच्छी होनी चाहिए।मेरी इकलौती बहन की शादी है",वो लड़का बोला।लड़के ने 5000 कीमत  की साड़ी पसंद की।उसने जब अपना पर्स निकाल कर रुपए दिए तो पार्थ ने देखा उसके पहिचांन पत्र को देखा।

"IMA - Dehradun

Name- Kramveer Saxena

Rank- Cadet

पार्थ के मन में फिर से फौजी बनने के उसके सपनो के  लिए लड़ने की चाह उठी। सिप्टेंबर का महीना बीत चुका था।रेगुलर कॉलेज में प्रवेश होना बंद हो चुके थे।पार्थ उदास हो गया।क्योंकि CDS के पेपर के लिए स्नातक का होना आवश्यक है।

अब तो वो ना ही प्रार्थना से कोई सलाह ले सकता था।ना ही उस से फोन कर सकता था।क्योंकि प्रार्थना की दादी ने घर किराए पर दे दिया था।और वो प्रार्थना के साथ देहली रहने लगी थीं।पार्थ ने उदास चेहरे के साथ चाचा की दुकान को बढ़ाया(बंद किया)।शाम का खाना खाकर पार्थ अपने कमरे में सोने चला गया।मोबाइल चलाते हुए पार्थ ,प्रार्थना को फेसबुक पर खोजने की कोशिश कर रहा था।लेकिन असफलता मिलती।तभी उसके मोबाइल पर मैसेज आया"India's Largest Open University IGNOU exteded their UG and PG addmission last date till 5 October"

पार्थ के लिए ये नोटिफिकेशन एक वरदान सा था।पार्थ ने तुरंत वेबसाइट से लॉगिन कर "BA in Defence" में एडमिशन ले लिया।आज रात पार्थ सुकून से सो पाया था।

पार्थ ने अपने सपने की ओर एक कदम बढ़ा लिया था।

पार्ट -19

पार्थ हर रोज फेसबुक पर प्रार्थना को खोजता।लेकिन असफल होता।धीरे धीरे साल बीतने लगे।पार्थ ने प्रार्थना को फिर से पाने की उम्मीद छोड़ ही दी थी।पार्थ का पूरा ध्यान अब अपने स्नातक के तृतीय वर्ष के पेपरों पर था।अप्रैल के महीने में पेपर पूरे होने के बाद पार्थ ने CDS की परीक्षा के लिए आवेदन किया।देहरादून के पलटन बाजार में पार्थ को सब लोग जानने लगे थे।वहीं पार्थ के चाचा के सामने वाली दुकान अब्दुल मिर्जा जी की थी।पार्थ और पूरा पलटन बाजार उन्हें अब्दुल चाचा बुलाता था।अब्दुल चाचा की उम्र ज्यादा होने के कारण उनकी बेटी अर्शी मिर्जा अक्सर उनकी दुकान की देख भाल करती थी।तीन साल पहले जब पार्थ देहरादून आया था तब अर्शी ही थी जिसने उसे पूरा देहरादून घुमाया था।अर्शी,पार्थ को पसंद करती थी।लेकिन शुरुआत में पार्थ सिर्फ प्रार्थना के विषय में सोचता था।लेकिन धीरे धीरे अर्शी के लाए गाजर के हलवे में पार्थ को प्रार्थना के लाए गाजर के हलवे सा प्रेम पाता।पार्थ भी अर्शी को पसंद करने लगा था।लेकिन पसंद करना जितना आसान होता है।उतना ही कठिन होता है उस पसंदीदा शख्स को पाना।पार्थ और अर्शी  हर रोज आमने सामने होकर भी बहुत दूर थे एक दूसरे से। उनकी दुकानों के बीच की जो सड़क थी।वो सड़क ,सड़क शायद पलटन बाजार से गुजरने वाले राहगीरों के लिए होगी।लेकिन पार्थ और अर्शी के लिए तो दीवार थी।जो समाज के लोगों ने बनाई थी।जिसे लव जिहाद और घर वापसी जैसे इजाद किए हुए शब्दों की ईटो से बनाया गया था। 

पार्ट-20

उम्र के साथ बीमारियों की गिरफ्त में आते अब्दुल चाचा अपनी एकलौती अर्शी के लिए परेशान रहते।एक दिन अब्दुल चाचा ने पार्थ के चाचा को पास बैठाते हुए बोला,"ठाकुर साहब,पार्थ की उम्र हो रही है शादी की।कब तक यूं ही ठाकुराइन जी पूरे घर का भार संभालती रहेंगी।उसका भी निकाह वगैरा करवा दीजिए।आपको भी आराम हो जाएगा"।

"मिर्जा साहब सोच तो मैं भी यही रहा था।लेकिन क्या करे इस परदेश जैसे शहर ने मुझे कभी अपनाया ही कहां।यहां अपनी कोई रिश्तेदारी भी तो नहीं है और आप तो जानते है हमारे गांव के लोग बिटिया को ज्यादा दूर भी नहीं ब्याहते हैं।",पार्थ के चाचा ने कहा।

"हमारा यहां कोई नातेदार नहीं बोलकर ,आपने हमे भी इस परदेशी शहर में पराया कर दिया ठाकुर जी",अब्दुल चाचा ने कहा।

छोटे कस्बों  से बड़े शहर आए लोग अपना जीवन इस शहर की चकाचौंध में खपा देते हैं।लेकिन भी भी वो शहर उन्हें कभी उतना अपना नहीं लगता।जितना कि उन्हें वो कस्बा या शहर लगता है जहां की गलियों में वो बेफिक्र होकर दौड़े थे।ये दर्द आज पार्थ के चाचा और अर्शी के अब्बू के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।

तभी अब्दुल चाचा ,पार्थ के चाचा के करीब आते हुए बोले,"ठाकुर साहब अगर बुरा न माने तो एक दरख्वास्त है आपसे"।

"इसमें संकोच कैसा मिर्जा साहब बोलिए "पार्थ के चाचा ने कहा।

"अर्शी और पार्थ एक दूसरे से प्रेम करते हैं।कल जब आपने मेरे लिए पार्थ से चने का साग भिजवाया था तब मैंने उन्हें बाते करते सुना। मैं मानता हूं कि मुझे उन्हें समझाना चाहिए था लेकिन ठाकुर साहब डर लगता है आज कल के बच्चों से।पता नहीं किस बात को दिल पर ले लें।इस लिए सोचा आपसे बात करूं। मैं भी अब शायद कुछ दिनो का मेहमान हूं।उसके बाद मालूम नहीं मेरी अर्शी का ख्याल कौन रखेगा।हमारी बेगम के गुजरने के बाद ठाकुराइन ने अर्शी को जो प्रेम दिया वैसा शायद ही उसकी अम्मी के सिवा कोई और उसे दे पाता,"मिर्जा साहब ये बोलते हुए उदास हो गए थे।

मिर्जा साहब की बातों को सुनकर उन्हें ढांढस बंधाते हुए पार्थ के चाचा ने कहा,"मिर्जा साहब ,अर्शी आज भी हमें हमारे घर का हिस्सा लगती है।आपने जो  प्रस्ताव दिया वो तो  ठाकुराइन हमें रोज कहती हैं।लेकिन मुझे इसी बात का संकोच था की ये धर्म के ठेकेदार कहीं हमारा जीना हराम ना कर दें।लेकिन अगर आपकी हां है तो हमारी भी हां है।अर्शी को अपनी  बेटी की रूप में पाकर हम तो धन्य हो जायेंगे।अब्दुल मिर्जा साहब आज अर्शी के लिए बेफिक्र हो गए थे।पार्थ जैसा नेकदिल,ईमान वाले लड़के को अर्शी मिर्जा के जीवन साथी के रूप में देख अब्दुल साहब प्रसन्न थे।जैसे अल्लाह ने आज उनके बेटे ना होने की कमी को पूरा कर दिया था।

...#जलज कुमार

... To be continue















Tuesday, 8 December 2020

प्लेसमेंट........एक सफल असफलता

                                                                            पार्ट-1

3 rd  ईयर में आते आते हमें ये तो पता चल गया था। हम हर क्षेत्र मे  अपना सर्वोत्तम दे सकते है परंतु इस अभियांत्रिकी(Engineering) में शायद कभी नही पर फिर भी हॉस्टल का हर लेखक, शायर ,गायक, क्रिकेटर, फुटबालर, कॉमेडियन, ना जाने क्यों पकड़ लेता था इंजीनियरिंग की उन किताबो को बस इतना कहकर की "यार शायद ये किताबो का बोझ ही कम कर सकेगा हमारी जिम्मेदारियों के बोझ को" और फिर सब की आँखे नंम हो जाती और हम फिर से खुद को समझाते,तभी "ले ना यार " कि एक आवाज के कुछ समय बाद हम उड़ा देते थे सभी परेशानियो को धुए में, पर एक खौफ रहता था अगर प्लेसमेंट ना हुआ तो, इस खौफ मे ना जाने कितनी रातों को जगाया था हमारे साथ, हॉस्टल की छत हमारे लिए माँ की गोद सी थी। जहाँ लेट कर हम खोल देते थे बेफ़िक् होकर अपने सारे राज,जिंदगी ने अपनी जद्दोहद को चालू रखा और हमने कभी उनको किताबो का नशा करके उड़ाया कभी धुए में, पर कोई  और था जिसे करीब  छत सा सुकूँ महसूस होता था जो मुझे अपने सपने बताती थी हम दोनो को पता था की हम शायद ही कभी मिल पाएंगे कॉलेज के बाद पर वो एक बात कहती थी "यार हम अभी अपने माँ पापा के सपने है और हमें उनके सपनो को सफल करना होगा " 

उसकी हंसी कुछ ऐसी ही थी कि  अपने गम को भूलना शायद कोई बडी बात नही तो हैं दोस्तों मैं स्वप्निल आपको बता रहा हूँ कहानी अपनी सफल हुई असफलता की , किताबो से ज्यादा वक्त मैं अब उसको देने लगा था,पर जब भी प्लेसमेंट का ख्याल आता तो हाथो में मैंकेनिकल ओब्जेक्टिव और R S अग्रवाल की किताब लिए बैठ जाता था । कुछ घंटो तक तो जोश रहा पर फिर मन नही लगता था अक्सर. ऐसा ही होता वक्त के साथ अगर ख्वाहिशे मुकम्मल ना हो तो हम  अफसोस और शोक दोनो ही जताना छोड़ देते है। कुछ ऐसा ही होता था मेरे साथ उन दिनों, जनवरी की कडकड़ाती सर्दी में हम छतो पर घूमते थे बाते बताते थे दोस्तो को अपने दिन के बारे में आज हमारा दोस्त अर्नब हल्का उदास था हम लोग उसके मजे ले रहे थे तभी उसकी आँख से आसुं निकल आये आज पहली बार हुआ था जब अर्नब को हमने रोता हुआ देखा था क्युकी ये वही अर्नब था जो सबको हँसाता था पूछने पर पता चला कि आज उसका ब्रेकअप हुआ है ब्रेकअप शब्द में ही कुछ टूटने का एहसास होता है पर ब्रेकअप में दिल नही टूटता, टूटता है विश्वास और वादे जो हम एक अंजान शक्स पर कर लेते है और अर्नब तो पागल था अर्नब ही क्यों अंतिमा भी तो उसका कितना ख्याल रखती थी एक बार तो अर्नब ने जब अंतिमा बीमार थी अपना पेपर भी छोड़ दिया था। और उसके बदले अंतिमा ने क्या दिया उसे आँसू, पर अंतिमा की भी तो कुछ भावनाए रही होंगी अर्नब को लेकर वो गलत है ये कहना शायद किसी के मौलिक अधिकारों का हनन है अक्सर ऐसा  ही होता है लड़कियां पहले किसी पर पूरा हक जताती

फिर तुम किस बात का हक जता रहे हो कहकर सब भुला देती है क्या इतना आसान होता है भूलना या भुलाना। हमने  अर्नब को सम्भाल लिया था। उसके दर्द को उस वक्त हमने नही संभाला था। पर आज जब रजाई मे  सोते वक्त जब मेरे मोबाइल पर मेसेज आया तो मेरे चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गयी थी क्युकी अवनि ने आज मुझे पहली बार  ❤ वाली  इमोजी भेजी थी। अचानक मै  उदास हो गया क्युकी मेरे सामने अर्नब के आँसू वाली तस्वीर और उसकी बात "क्यों लडकियां व्यापार और प्यार में अंतर नहीं कर पाती ?"

   "सुबह 6: 30 बजे मेरा MD का लेक्चर था और अवनी की भी पावर इलेक्ट्रॉनिक्स की क्लास थी। इसी लिए मैं आज सुबह 6 :00 बजे ही रूम से निकल गया था। क्युकी उससे मिलना था। मै जब कॉलेज गेट पर पहुंचा तो वो दिख गयी । मैंने उससे गुड मॉर्निंग बोला तो उसने थोड़ा नाराज होकर बोला " गुड मॉर्निंग मिस्टर इग्नोरर। मुझे समझ नही आई उसकी इस बेरुखी की वजह,मैंने पूछा क्या बात है तो बोली रात मे मेसेज सींन कर  जबाब क्यों नही दिया। मै चुप हो गया, वो बोली "बताओ बताओ" । "हर सवाल का जबाब नही होता अवनि कुछ समझने पडते हैं " और इतना कहकर में क्लास लेने चला आया पूरी क्लास में शर्मा सर कुछ पढाते रहे पर मेरे मन में जब भी अवनि के उस मेसेज की तस्वीर और अर्नब की वो बात दोनो एक आंतरिक युद्ध कर रहे थे। सच मे  युद्ध मे किसी की जीत नही होती क्युकी दोनो पक्षों ने कुछ ना कुछ तो खोया होता है और मैं नही चाहता था कि मै उसको पाकर खोऊ, आखिर क्यों इतना जुड़ाव हो गया था।मुझे अवनि से 1 साल पहले ही तो वो मिली थी। पता कैसे वो मेरी जिंदगी के अहम शख्सो में शामिल हो गयी, यही तो उसकी खूबियत थी। जिसके भी करीब जाती थी उसको अपना बना लेती थी। कोई छोड़ना ही नही चाहता था उसका साथ, उसकी क्लास का टॉपर अंकित तो उसको नोट्स मे लवलेटर लिख कर भेजता था। एक बार पकड लिया मैंने उसको, वो तो डर ही गया था। तब से आज तक अवनि और मैं साथ में नोटस बनाते है । उसके नोट्स के चक्कर में मुझे पता चला की TV और Antina भी सब्जेक्ट होते हैं और वो मुझसे पूछती थी स्वप्निल "ये  TOM कौन सा सब्जेक्ट है यार "  और खिलखिलाकर हंसती थी। और मैं बस उसे एक टक देखता ही रहता, 

सच में उसके साथ पता ही नही चलता था दिन का, 

सारी थकान गायब सी हो जाती थी "जब उसको होस्टल छोड़ते वक्त उसकी "बाय स्वप्निल " को सुनता था।" वक्त तेजी से बीत रहा था फरवरी आ चुकी थी। 

मैं अपने करीयर के बारे मे ज्यादा सोचने लगा था। और थोडी टेंशन भी रहती थी। इस लिए अब अवनि के मेसेज के  रिप्लाई भी कम देता था। मैं चाहता था की वो मुझसे कम बात करे क्युकी मुझे पता था कि कॉलेज के बाद उसको भूलना मेरे लिए सिर्फ शब्द रहे जायेंगे। यही तो हमे सिखाती है इंजीनियरिंग , कम खर्च में बेहतरीन, यही चाहता था मैं कि हम अलग होने पर भी बेहतरीन रहे पर एक दोस्त के रूप में, आँसू और अपने सपनो को इन पर खर्च ना करे। मैं होस्टल पहुँच चुका था। सच में जिम्मेदारियां और सोच कदमो की रफ़्तारो को थाम देती है ।यही कारण था कि मैंने 10मिनट की दूरी आधे घंटे मैं तय की थी उस दिन ..... 

 होस्टल पहुंचना हमारे लिए खुशी की बात होती थी। क्युकी हमारा घर इसके कमरे, गालियाँ इसकी गैलरियाँ होती थी।तो इन गलियों में ,अरे भाई गैलरियोँ में हल्ला होना आम बात थी। यहाँ के हमारे पडोसी बड़े तो हो गए थे पर  उनका बचपना नही गया था। तभी तो कभी पानी डाल जाना, कभी गेट को पैर मारकर खोल देना ,जैसी इनकी हरकते आज भी जिंदा थी लेकिन एक बात जरूर सीखने को मिलती है होस्टल से कि  अगर आप में बचपना है तो आप हर मुसीबत को आराम से पार कर लोगे क्युकी बचपन चिंताओ मुक्त होता है। और चिंताएं ही हमारी प्रत्येक मुसीबत की पहली वजह होती है। शाम के आठ बज चुके थे खाना खाने के लिए इसी समय घंटी बजती थी। पर हम हॉस्टलर पहले से ही थाली बजा देते  थे। इस कारण उस घंटी का बजना जैसे आज के समय में "लिव-इन-रिलेशनशिप "को शादी नाम का एक डॉक्यूमेंट देने जैसा होता था। वरना जान तो हर कोई जाता था कि खाना मिल रहा है। वैसे ये तो सदा सत्य बात है कि बिना एक पंजाबी और बिहारी लड़के के  कोई  होस्टल होस्टल नही होता ,लेकिन हमारे होस्टल मे  तो बिहार के लडके बहुत थे। मेरी ब्रांच मैकेनिकल में  लव झा और संजू यादव थे पर  पंजाब वाला लड़का ऑटोमोबिल से था। उसका नाम सूरज सिंह था। खाना खाते हुए इनकी बातों की आवाजो से शमां बंधा रहता था और इनके जाने की बाद सब खामोश, खाना खाकर मे  अपने रूम मे आ चुका था तभी मेरे रूममेट भानू ने बोला "भाई तेरा फोन बज रहा है बहुत देर से ",मैंने फोन उठाया तो अवनि की चार मिसकाल थी। मैंने दोबारा उसको कॉल लगाया तो उधर से आवाज आयी। 

" जी फुर्सत मिल गयी जनाब को " , मैं समझ गया था कि अब अवनि फिर नाराज हो गयी है। मैंने बोला "जी क्या करे जनाब को भूख भी लगती है तो बस  उसी का बंदोबस्त कर रहे थे अगर हमारी वजह से मोहतरमा को कोई तकुल्लुफ हुआ हो तो माफ करे"

, "हा हा बस बस माफ करो जो आपके सामने हिंदी और उर्दू का प्रयोग किया " अवनी ने कहा। फिर वो बोली " यार हमारे कैंपस के लिए कम्पनी आ रही है", 

मैंने बोला "तो इसमे उदास  होने की क्या बात है ये तो अच्छी बात  हैं  ", " तुम्हे याद है जब हम इंटर्नशिप पर थे तो हमने क्या प्लान किया था कि हमारी ब्रांच अलग है पर हम जॉब साथ में करेंगे याद है " अवनी ने कहा, मुझे याद आ गया वो दिन जब हम इंटर्नशिप के लिए भेल हरिद्वार में गए tथे,उस दिन हरिद्वार घाट पर मैं उसके करीब बैठा था आसमां में चाँद चांदनी के साथ अठखेलिया खेल रहा था, सितारे थे जो छिपछिप कर देख रहे थे चाँद को,इसी का प्रतिबिंब घाट के किनारे पर बहती माँ गंगा पर पड रहा था । जल की पवित्रता को शायद अवनी ने पढ कर मेरा हाथ थाम लिया था और वो बोल रही थी "स्वप्निल एक वादा करो मुझसे क्या तुम मेरे दोस्त की तरह यूँ ही मेरे हर सुख दुख मे मेरा साथ दोगे", उसकी आँखों मे हल्के आँसू आ गए थे, मैने उसको उस वक्त हँसाने के लिए कह दिया था। कि " यार टेंशन ना ले हम एक ही कम्पनी मे  जॉब करेंगे " और उसके आँसू अपने हाथो से पोछकर उसको अपनी ह्रदयगति का आभास कराने लगा था। 

" अरे कहाँ खो गए जनाब स्वप्निल" अवनी ने फोन पर जोर से कहा , मैंने उससे बोला "कहीं नही , यार अवनी जिंदगी हमारे नही उपर वाले के प्लान के हिसाब से चलती है , और हाँ तुम कल प्लेसमेंट के लिए जाओगी जरूर "

अवनी बोली "तुम साथ चलोगे एक्जाम हॉल तक "

मैंने कहा "हाँ, ओके बाय  गुड नाईट"

"ओके गुड नाईट & हॉरर ड्रीम , हा हा, " अवनी ने कहा, 

इन बातों में जो प्यार था हम दोनों के बीच वो कौन सा प्यार है ? इसकी तलाश मुझे हर वक्त रहती थी। 

पर ना जाने क्यों कुछ लोग हमारी जिंदगी में ऐसे आ जाते हैं जिनके प्रति हमारा व्यवहार वृक्ष और नदी के समान हो जाता है। जिन्हे सिर्फ उनसे लाभांवित होने वाले व्यक्ति की मुस्कराहट में ही सुकूँ मिल जाता है ।

.आज मैं सुबह जल्दी उठ गया था। मैंने स्नान कर प्रभु के समक्ष अवनी के लिए प्रार्थना की थी। हमारी आदतों मे  होता है। हम माँ-बाप और ईश्वर को  सदैव अपने कठिन समय में याद करते है। कॉलेज जाते टाइम मैंने उसके लिए डेयरी मिल्क की चॉकलेट ले ली थी। अवनी  कॉलेज गेट पर खडी थी मुझे देखते ही बोली "कभी तो टाईम पर आया कर यार  स्वप्निल " , मैंने उसको डेयरी मिल्क की चॉकलेट देकर बेस्ट ऑफ लक बोला , वो मुस्करा कर बोली "तेरे इस बेस्ट ऑफ लक की तो बहुत जरूरत है ,ओके मिलती हूँ एक्जाम के बाद ", मैंने पूछा कंपनी  कौन सी है और उंगलियो से पैकेज  की ओर इशारा  किया " , वो रुकी और बोली TCS  और  ये 7.6 लाख ,उंगलियों से इशारा करते हुए और फिर बाय बोल कर एक्जाम  हॉल की और चली गयी।

 उसके जाने के बाद मैं अपनी SOM(Strength of material)की क्लास लेने चला गया पर क्लास के बाहर  पार्क में प्यार और इंजीनियरिंग के अंतिम चरण पर पहुँच चुके कुछ नवयुवक और नवयुवती एक दुसरे से आलिंगन हो कर बैठे थे और एक तरफ खुद को और किस्मत को कोसने वाले और एक तरफा प्यार के वाहक  कुछ युवक काक चेष्ठा  और वको ध्यानम लिए  खड़े थे। पता चला मिश्रा सर आये नही थे। कॉलेज के अंतिम दिन होते ही ऐसे है। इन दिनों में टीचर लड़को से पिछले सालों के सारे बंक क्लासेस का बदला खुद क्लास बंक करके ले लेते है । आगे भी दो क्लास खाली थी तो में कैंटीन में चाय पीने चला गया तभी भानु पास आकर बैठे गया। मैंने कैंटीन वाले भैया से बोला " भैया दो कटिंग चाय", भानु बोला भाई क्या है यार हमारे लिए कोई कंपनी नही आयेगी क्या? " "देखते है भाई " मैंने कहा, तभी  चाय आ गई।

चाय पीकर मैं बाहर निकला तो अवनी अपनी सहेलियो के साथ आ रही थी। मुझे देख हल्का मुस्करायी, मैंने आँखों के इशारों से प्रश्नवाचक भरे लहजे में पूछा "पेपर कैसा हुआ"। उसने पलकों को झपकाते हुए सिर को उपर नीचे कर के अच्छा हुआ के संकेत दिया। अवनी और मैंने पहले ही एक वादा किया था कि हम कभी भी एक दूसरे के दोस्तो के बीच बात नही करेंगे। 3:45 की  RAC की क्लास लेने के बाद हम लोग हॉस्टल चले आये थे। 

रात को खाना खाने के बाद मैंने अपना मोबाइल देखा तो अवनी की 4 मिस्डकाल और एक मेसेज " कॉल मी अर्जेंटली" लिखा हुआ आया था। मैंने ज्यों ही उसे कॉल करना चाहा तो उसकी वीडियो कॉल आ गयी मैंने तुरंत काट दी फिर अच्छे से टेबल लैंप जला कर और थोड़े बाल संभाल कर उसे दोबारा कॉल किया तो अवनी की आँखों से आँसू निकल रहे थे। मैंने बोला" इसमे रोना क्या कोई नही किसी और कंपनी में हो जायेगा" तभी उसकी सहेली राशि ने बोला यार ये पागल है। इसका हो गया । ये रो इस लिए रही है क्युकी अब तुम्हारे साथ जॉब नही कर पायेगी।वो पल मेरी जिंदगी का सबसे अजीब पल था क्युकी उस दिन मुस्कराहट मेरे लवो पर थे पर एक अजब सी वेदना ने मेरे ह्रदय भावो पर आघात किया था तभी राशि बोली संमझाओ इसे स्वप्निल,। क्या समझाता मैं उसको की तुम्हारे एक वचन की वजह से मैं बंधा हुआ हूँ या ये की तुमसे ज्यादा आँसू मेरी इन आँखों में  हैं जो रो भी नही सकती। तभी मैंने खुद को सम्भालते हुए बोला "बधाई हो TCS  की नई एम्प्लॉयी मिस अवनी जी को "। उसने अपनी हथेलियों से आँसुओं को पोछकर बोला "थैंक्यू स्वप्निल तेरे बेस्ट ऑफ लक का ",। मैंने बोला "थैंक्यू से काम नही चलेगा पार्टी कब मिलेगी " ' उसने मुस्कराकर कहा जब तुम चाहो।

मैंने कहा" हाँ वो तो हमारा हक है  और 😂 वाली इमोजी भेजी,। अवनी बताने लगी कि उससे इंटरव्यू में क्या पूछ गया।उसने कंपनी को बताया की उसको आगे पढना है। ना जाने क्या था उसकी बातों में क्युकी मैं कभी थकता नही था उससे बात करने को। कई बहाने मै ढुंढ लेता था।तभी अवनी बोली, "चल बाय  &गुड नाईट  स्वप्निल मिलते हैं कल।

. उस रात लगभग दस बज चुके थे।तभी मेरा रूममेट भानू आया और बोला यार स्वप्निल चल बे छत पर चल। जनवरी की कड़कडाती सर्दी में छत पर जाना जिंदगी को जोखिम मे डालना पर कंमबख्त ये दोस्त तुम्हे कहीं पर भी ले जाते है, उपर से रूममेट, थोडी देर में, मैं छत पर था और हमारे आसपास बैठे थे हॉस्टल के वो लड़के जो सिर्फ एक ही ज्ञान देते थे "भाई नौकरी तेरी भी लगेगी नौकरी मेरी भी लगेगी,हाँ थोड़ा बहुत अंतर होगा रुपयो का ।"

 तभी उनमे से एक महानुभाव  बोला "अरे यार जिसकी ना लगे हम उसकी लगवा देंगे " कई लड़के जो युद्ध से पहले ही हथियार डाल चुके थे। उस मित्र के करीब हो गए और बोले " हाँ ये बात तो सही कर रहा है। इसके चाचा एक बडी कंपनी में अच्छे पद पर हैं"। बस फिर क्या था जनाब खुश, तभी उस महफ़िल के मुख्य कार्यकरता ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली,पीछे से आवाज आयी कौन से लाये ही बे,"रेड ब्लैक "मुख्य कार्यकरता ने पीछे से आयी इस प्रश्नवाचक ध्वनी का का उत्तर दिया। अगर हॉस्टल की  इस महफ़िल को बाबा साहब देख लेते तो वो जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए आरक्षण से पहले ऐसी संगोष्ठियां करवाते यहाँ सब समान होते थे और छुआछूत को तो ये लोग एक दूसरे के द्वारा उपयोग की गयी सिगरेट के सहारे कश भर कर उड़ा देते थे।गोलाई मे सजी इस महफ़िल का नियम था की पहली सिगरेट के बाद ही दुसरी सिगरेट को जलाया जाता था।

 पांच महानुभावों से चुंबन प्राप्त कर ये बेबस सिगरेट मेरे पास आयी थी। चाहती थी वो कि मैं उसको मोक्ष की प्राप्ति अपने होठो से कराऊँ पर  मैं अनुभवहीन प्राणी उस तड़पती आत्मा की संतुष्टि का कारण ना बन सका और भानु के द्वारा उस मोक्ष की प्राप्ति हुई।

 वैसे अगर  व्यक्ति और सिगरेट की तुलना की जाए तो ज्यादा अंतर कहाँ होता है। दोनो की जीवन यात्रा में दोनो को कई लोगो के हाथो से गुजरना पड़ता है। हर व्यक्ति अपनी सुविधा अनुसार उपयोग करता है जीवन भी सुलगता है ।आग रूपी परेशानियों से और अंत मे बचती है सिर्फ राख,अरे में भी आध्यात्मिक हो रहा हूँ। क्या करे इन महफ़िल में हर व्यक्ति ज्ञान बाँटता है।

 यही कारण है इंजिनीयरिंग के आखरी सेमेस्टर में लगभग 75 प्रतिशत बालको को बाबागीरी में उज्ज्वल भविष्य नजर आता है और हो भी क्यों ना अब तो बाबा स्टार्टअप भी कर रहे है। विश्वास नही तो  कपालभासी वाले बाबा को ही देख लो। इस महफ़िल में रेगुलर सदस्यता देने वाले सदस्यों का एक पैनल था। जो नये सदस्य को पहले बकरे की तरह खिलाता था और फिर काटता था पर यह काटना किसी बन्दी द्वारा काटे जाने वाले काटने से अच्छा था क्युकी यहाँ पर सबका कटता था समय और जेब । बहुत कोशिशो के बाद भी पैनल मुझे सदस्यता देने में असमर्थ था क्युकी मे  सिर्फ उनके चखने में व्यस्त था। हरी मटर और हल्दी राम की आलू की भूजिया को कौन मना कर सकता है क्युकी मैं घर से इनके लिए हर बार नमकींन लाता था जो इनकी आपात कालीन परिस्थिती में मदद करती थी। इस लिए मुझे इनमे से भी कोई मना नही कर सकता था।

" चलो भाई का वार्डेंन आयेगा सुबह जल्दी जगाने कल 26 जनवरी के लिए" मुख्य कार्यकर्ता ने कहा, भले ही 26 जनवरी को देश को गणतंत्र के सूत्र में बाँधा गया था पर ये दिन हम होस्टलर को सिर्फ अलग अलग करता था वो भी कॉलेज के मैदान की सफाई के लिए। अत: हम सभी बिना विलंब किये अपनी अपनी लुगाई अरे भाई लुगाई नही रजाई की और चल दिये। 2 बज चुके थे और सुबह 5 बजे उठना था। इस लिए मैं जल्दी से अपने बिस्तर पर लेट गया और मेरी रजाई ने मुझे आलिंगन कर लिया ।

लगभग 4:30 बजे थे। कोई कमरे का गेट जोर से खटका रहा था।भानू ने उठकर देखा तो वार्डन सर थे। तेजी से बोले" उठ जाओ आशिको और जल्दी से असेमब्ली में चलो " ,वार्डन के जाने के बाद उनके लिए चार गालियाँ देने के बाद सभी लोग तैयार हुए और पहुँच गए ग्राउंड को साफ करने।हमने लगभग 6:30 तक ग्राउंड को साफ कर दिया था। उसके बाद वापस हॉस्टल जाते टाईम अवनी मिल गयी। उसने कहा "स्वप्निल, मैं और राशि आज कॉलेज की परेड के बाद मूवी देखने जायेंगे तुमको भी चलना है "। मैंने कहा यार मुझे कपड़े धुलने है। "वो हँसी और बोली, प्लीज यार चल ना अब दिन ही कितने बचे है साथ मे बिताने को"। मैंने कहा "ठीक है चलूँगा"। दस बजे मैं कॉलेज आ गया था। ध्वजारोहण के समय  राष्ट्रगान हमेशा से मेरे खूबसूरत पलो में शुमार था। क्युकी यह पल प्रत्येक भारतीय के दिल सबसे करीब होता है।कुछ कार्यक्रम होने के बाद बूंदी के लड्डू का वितरण हुआ। ये बूंदी के लड्डू भी हमें जाने अंजाने मे  एक सीख दे जाते है। कि एक बार टूटने के बाद किसी भी चीज में वो पुरानी बात नही रहती। फिर चाहे दोबारा उसे कितने भी प्यार से संवारा जाए। 

मैं बूंदी के लड्डू की लाइन में अपनी बारी का इंतजार कर रहा था तभी अवनी ने सामने आकर इशारा किया पर मैंने उसको कुछ समय इंतजार करने के लिए कहा। 5 मिनट बाद मुझको बूंदी के लड्डू का प्रसाद मिल गया।  अवनी बोली यार इतना क्या जरूरी था ये लड्डू के लिए 5 मिनट बर्बाद करना। मैंने उससे कहा चलते चलते बताता हूँ " अवनी तुझे पता है कि हमारे यहाँ दिवाली, होली पर अगर कुछ चीज बांटी जाती है। तो लोग उस प्रसाद समझ कर लेते है "तभी अवनी बोली " ऐसा तो मेरे यहाँ भी होता है पर इससे इसका क्या संबंध " मैंने कहा ये भी तो राष्ट्रीय पर्व है। तो ये बूंदी का लड्डू भी तो प्रसाद ही हुआ। तभी अवनी थोड़ी उदास हुई और उसने मेरे हाथो से थोड़ा लड्डू लेकर खा लिया । हमारे सामने राशि आ गयी थी। मैंने पूछ कौन सी टॉकीज में  चलना है तो अवनी बोली "पी वी आर मे  और मैंने टिकिट भी बुक कर ली है " अवनी की यही बात अच्छी थी। वो हमेशा हर काम के लिए पूरा प्लान बना के रखती थी। हम लोग पी वी आर पहुँच चुके थे। मैने पोस्टर की तरफ देखा तो मूवी का नाम लिखा था "हाफ गर्ल फ्रेंड" बेस्ड ओन चेतन भगत बेस्ट सेलिंग नोवेल। . 

तीन बज चुके थे और हम लोग मूवी हॉल के अंदर थे। कुछ व्यवसायिक विज्ञापनों के बाद शुरू हुई चेतन भगत के बहुचर्चित उपन्यास "हॉफ गर्ल फ्रेंड " पर आधारित फिल्म मुख्य नायिका की भूमिका में हमारे बचपन के विलेन शक्ति कपूर की बेटी श्रद्धा  ने देहली की हाई सोसायटी की लड़की रिया सोमानी का किरदार निभाया था और एक तरफ स्पोर्टस् कोटा से भर्ती हुए अंग्रेजी की ऐसी की तैसी करने वाले  बिहार के बबुआ माधव झा का किरदार निभा रहे थे अपने पानीपत वाले अर्जुन कपूर। बरसात से शुरू हुई इस फिल्म ने इंटरवल तक हमे रूला दिया था । अवनी बार बार पूछ रही थी "का स्वप्निल बबुआ कछु बुझात की नही " मैं अचंभित था की अवनी भोजपुरी बोल रही थी। वरना" बी एच यू कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग" के प्रांगण में हम आज तक नही सुने अवनी के मुँह से भोजपुरी, मानते हैं की पूर्वांचल पर भोजपुरी भाषा का प्रभाव है परंतु अवनी जैसी साउथ देहली की लड़की से इतनी लयमय भोजपुरी। 

तभी अवनी ने बताया उसकी माँ बिहार के बक्सर जिला से हैं। रिया सोमानी माधव झा को अपनी शादी का कार्ड देने आयी थी। इंडिया गेट पर फिल्माया गया ये दृश्य वास्तव मे देखने लायक है। रिया सोमानी की आँखो से आँसू निकल रहे थे और इसी के समांतर अवनी की भी आँखे नम हो रही थी।तभी मुझे अपनी अंगुलियों पर किसी का स्पर्श प्राप्त हुआ। अवनी ने मेरी हथेली को अपनी नर्म हथेली से जकड़ लिया था पर उसका ध्यान सिर्फ फिल्म के उस सींन पर था जब रिया माधव से दोबारा पटना में क्लोजअप के ऑफिस मे  मिलती है। अवनी ने मेरे सिर पर अपना कंधा रख लिया। राशि इस पूरे दृश्य को अपनी निगाहों को तिरछा कर देख रही थी। मैं जानता  था कि मुझे अवनी से प्रेम था। प्रेम जिसे मैं अपनी वाणी के शब्दों से भी बयाँ ना कर सकता था पर मेरी हर कोशिश के समक्ष हरिद्वार मे  माँ गंगा किनारे अवनी का वो वादा " स्वप्निल एक वादा करो मुझसे, क्या तुम मेरे दोस्त की तरह यूँ ही मेरे हर सुख दुख मे मेरा साथ दोगे" प्रतिरोध था। अवनी के आँसुं उस समय हमारी हथेलियों के बीच गिरे जब माधव ने रिया को वापस एक रेस्ट्रो में "स्टिल अ लिटिल लोंगर विथ मी " गाते सुना, फिल्म समाप्त हो चुकी थी पर अवनी के आज के इस व्यवहार ने मेरे समक्ष उन प्रश्नो को फिर से नये सिरे से उत्पन्न कर दिया था। जो मैंने हरिद्वार में उस वादे के वाद विसर्जित किये थे।ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो प्रश्न जो मैने हरिद्वार में माँ गंगा के चरणो मे विसर्जित किये थे। वो गंगा के मैदानी क्षेत्रों से अनुभव लेकर आज फिर इस काशी की गंगा से निकल कर मेरे समक्ष खड़े होकर मुझे प्रश्न वाचक नजरों से देख रहे हों। 

.शायद 6:45 का समय हुआ था जब हम लोग अवनी के हॉस्टल पहुंचे थे। मैंने ऑटो वाले को किराया दिया फिर अवनी को मूवी के लिए थैंक्स बोला। ये थैंक्स सिर्फ मूवी के लिए ही नही बल्कि अवनी द्वारा मेरे हाथ को थामने और  मेरे कंधे पर सिर रखने के लिए भी था। अवनी बोली "स्वप्निल तू थैंक्स कब से बोलने लगा और मुस्करायी "। " जब से तुमने फ्री की मूवी दिखाना शुरू की है " मैंने उत्तर दिया। तभी राशि बोली "चल अवनी लेट हो जायेंगे" और मेरी तरफ देख कर बोली "स्वप्निल बाय"। "बाय " मैंने उत्तर दिया  और अपने हॉस्टल की और निकल आया। लगभग 7:20 तक मैं हॉस्टल गेट पर पहुँच गया था। तभी भानू और हमारी छत वाली महफ़िल के मुख्यकार्यकर्ता ने मुझे आवाज लगाई और दोनो मेरे पास आकर बोले कि " कल अर्नेब का जन्मदिन है हम लोग केके लेने जा रहे हैं। तुम सब लोगो को बता दो और "GPL" के लिए सबको तैयार कर लो"। "हाँ बता दूंगा मैं हूँ सबको" मैंने उत्तर दिया। हॉस्टल में जाकर मैंने सबके रूम में यह खबर फैला दी और  "GPL" के लिए सब तैयार रहे ये कह दिया।

 "GPL"

प्रत्येक  हॉस्टल में दी जाती है इसके लिए कुछ मुख्य अवसर घोषित होते हैं जो हॉस्टलर अपने मन के हिसाब से बना लेते है जैसे - किसी के नम्बर ज्यादा आना, किसी की प्रेम कहानी की शुरुआत होना, प्लेसमेंट होना, नये कपडे आने पर, नई हेयर स्टाइल कटाने पर और जन्म दिन के दिन तो ये सेवा बिना किसी प्रतिरोध के दी जाती है। ये सेवा प्राप्त करने वाला व्यक्ति कुछ समय के लिए अपनी जिंदगी मे होने वाले इस शुभकार्यों के लिए खुद को कोसता है। 

रात के 11: 55 हो चुके थे। हॉस्टल में चारों तरफ अफरा तफरी मच गयी थी। सभी लोग अपने हाथो में चप्पल और जूते लिए हुए थे। अर्नेब इस समय समझ चुका था कि कोई भी प्रतिक्रिया उसके लिए इस समय घातक हो सकती है। इसी लिए अर्नेब अपनी तशरीफ को अपने हाथो से  छिपा रहा था। 12 बज चुके थे तभी चप्पलों और जूतों की बौछारों के बीच अर्नेब की आवाज दब गयी थी। थोडी देर बाद हम लोगो ने केक काटी और कुछ देर में वो केक हम सबके मुँह पर थी तभी अर्नेब के मोबाईल की घंटी बजी, अंतिमा का काल था। 

अर्नेब ने कॉल उठाया और हम लोग बात सुनने उसके पीछे चले गए। आज ये पहली बार था। जब अर्नेब ने हमें मना नही किया था या हमे गाली देकर भगाया नही था। रिश्ते भी काँच या मिट्टी के बर्तनो के समान होते है। जब तक टूटते नही तब तक हम उनको सबसे बचाकर रखते है और जब एक बार टूट जाते है या उनमे हल्की दरार आ जाती है। तो हम उनके प्रति लापरवाह हो जाते है। अर्नेब भी कोशिश करता था। उसे भुलाने कि पर अर्नेब के लिए उसको भूलना शायद अपने जिंदगी के इन 20 सालों के भूलने के समान था। क्युकी वो उसके बचपन की दोस्त थी या कहूँ कि उसका बचपन थी ।उसी ने तो सिखाया था अर्नेब को क्लास में आगे बैठना । यहाँ तक की उसे अर्नेब की पसंद और ना पसंद सब पता था। अर्नेब के बचपन से लेकर इस इंजीनियरिंग में आने तक के हर संघर्ष और हर्ष में अवंतिका उसके साथ थी।

पता नही क्यों लड़कियां नही तलाशपाती अपने बेस्ट फ्रेंड मे वो शक्स जो उनकी जिंदगी में रंग भरता है। क्यों वो अपना लेती हैं। ऐसे शक्स को जो उन्हे प्रेम से कोसो दूर रखता है और यातनाएं देता है। जिसे ना उसकी पसंद का ख्याल रहता, न ही  उसका, मैं यह नही कह सकता कि हर लड़की के साथ ऐसा होता है या हर लड़का ऐसा करता है पर जो भी करता है। आखिर वो क्यों करता है।  क्यों दब जाते है? धर्म और जाति के नीचे दो प्रेम करने वाले, क्यों जातियाँ इंसानियत से उपर हो जाती है। क्यों एक पिता सामाजिक मजबूरी में आकर बचपन मे जिस बेटी के सपनो को पूरा करने की सौगंध खाता एक उस बेटी और उसके सपनो की हत्या कर देता है । क्यों नही समझते माँ बाप कि समाज से जरूरी उनके पुत्र पुत्री और उनके सपने है। 

और क्यों नही समझते वो बच्चे भी जो आकर्षण को प्रेम की परिभाषा दे देते हैं।  क्यों नही समझते ये बच्चे कि किसी  की मांग भर उसके साथ सात फेरे लेना ही शादी नही होती ,शादी होती है उन सात फेरों के वक्त लिए सात वचनो को निभाना, पर होता क्या है? प्रेम और जाति, समाज के युद्ध मे प्रेम हार जाता है। प्रेम हार जाता है  तलाक के समय, किसी बच्चे के द्वारा माँ बाप को घर से निकालते समय, जीतता है समाज और इसकी जातियाँ। प्रेम हार नही मानता और उठ जाता है। किसी और ह्रदय  में और ललकारता है। जातियों और समाज को फिर से, और एक लड़की पाती है वही प्रेम फिर से अपने पिता से , भाई से, मित्र से और अपने जीवन साथी से। इन्ही में से एक प्रेम था। जो अर्नेब और अवंतिका के बीच एक सेतु का कार्य कर रहा था।

 अर्नेब ने मोबाइल पर बोला "हेल्लो हाँ बताओ" " हैपी बर्थडे अर्नेब "अवंतिका ने कहा।, " थैंक्स अब्बू " अर्नेब ने कहा, "कल सुबह मिलना है तुमसे ,टाईम है" अवंतिका ने कहा,। "अब्बू अब तू भी टाईम मांगेगी" अर्नेब ने कहा और बोला "कल मिलते है, एंड थैंक्स फॉर विशिंग , गुड नाईट"अब्बू । हाँ प्यार से अवंतिका को अर्नेब अब्बू ही बुलाता था। वो बोलता था की अवंतिका ने बचपन से मेरी हर विश पूरी की है।  जैसे अब्बू करते है। अर्नेब की माँ मुस्लिम और पापा हिंदू है। इस लिए वो अम्मी को मम्मी और पापा को अब्बू बोलता था। अर्नेब खुश था। वो ही मुस्कान फिर थी, उसके चेहरे पर।वैसे लड़कियां भी भगवान सी होती है। कभी भी किसी को खुशी और आँसू देने की योग्यता रखती है।चाहे वो किसी की होठो की मुस्कराहट बन कर हो या फिर उस मुस्कराहट को आँसुओं मे  बदल कर। हम सब लोग अपने अपने रूम मे आ गये थे। मैंने अपनी रजाई को ओढा ही था ,तभी मेरे मोबाइल पर मेसेज की आवाज  आयी , मैंने चेक किया तो अवनी ने 😘 कि इमोजी भेजी थी। मेरा सुलझा हुआ दिमाग फिर से प्रश्न करने लगा जो जायज थे "आखिर क्यों लड़कियां इतना हक जताने के बाद फिर कहती है, तुम कौन से हक से ये बात कर रहे हों"।

फरवरी का महीना शुरू हो चुका था। ये महीना हजारों दिलों के टूटने का बोझ अपने कंधे पर लिए सदियों से जी रहा है क्युकी इसको पता है कि दिल तोड़ने के साथ साथ ये उन दिलो को जोड़ता भी है। जो समाज में इसकी गरिमा को बनाये रखेंगे। गुलाब की कीमतें इस महीने में आसमान को छू लेती है। क्युकी लोग इसका प्रयोग अपनी अपनी प्रेमिकाओ को , जिन्हें वो अक्सर चाँद कहते है, को लुभाने में करते है।कई गुलाब, ख्वाब पूरे करते है। कई गुलाब ख्वाब तोड देते है। टूटना हमेशा ह्रदय को आघात पहुँचाता है फिर भी ना जाने क्यूँ लोग आसमान में टूटते हुए तारों से दुआएं मांगते है।बचपन में दादी कहती थी "स्वप्निल जो व्यक्ति टूट जाता है ना,उसकी हाय और दुआए दोनो असरदार हो जाती है। आज ऐसा ही लगता है।

7 फरवरी की सुबह थी हॉस्टल के बाग में लगे गुलाब गायब हो चुके थे। सात दिन तक चलने वाले इस प्रेम के त्यौहार का आज पहला दिन था। आज गुलाबों  से सजे बुके और खुद को गुलाबों सा निखारती हुई लड़कियां ही नजर आ रही थी सड़को पर और उन गुलाबों की खुबसुरती पर मंडराते भँवरे।सड़को पर कई फूल बिखरे हुए थे। मुझे  इस समय फूलो की दुर्दशा देख छायावाद के कवि माखन लाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा की पंक्तियाँ" चाह नही, मैं सुरबाला के घहनो में गूंथा जाऊँ, चाह नही मैं विधप्यारी को लल चाऊँ" याद आ रही थी, तभी पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा "स्वप्निल, मुझे एहसास हो गया था कि ये अवनी ही है। मैं पीछे मुड़ा तो देखा गुलाबी ड्रेस में गुलाब लग रही अवनी, मेरे सामने खडी थी और मैं भँवरो सा उसके पास खड़ा हुआ था। प्रेम रोग भी ऐडी  की चोट जैसा होता है, जब तक खुद को ना लगे तब तक दूसरे के हालात समझ ही नही आते.। ... 

चमकदार छोटे छोटे सितारों से सजी अवनी की गुलाबी ड्रेस, माथे पर छोटी सी गुलाबी बिंदी और कानो मे गुलाबी नख से जड़े झुमके, अवनी और मेरे प्रति उद्दीपन को प्रकट कर रहे थे। तभी अवनी ने कहा, " कहाँ खो गए मिस्टर स्वप्निल, मैंने मन में बड़बडाते हुए कहा, "तुम्हारी आँखो में', अवनी ने शायद पढ लिया था मेरे मन को।  वो मुस्करा कर बोली "तो बताओ किसी लग रही हूँ मैं,। मैंने हँसते हुए कहा ,"कतई जहर"। वो हंसती रही कुछ मिनिटो तक फिर बोली, "तो मिस्टर स्वप्निल मेरे लिए रोज वगैरा नही लाये।

मैंने अवनी की इस फरमाईश को सुनकर ,उसका हाथ थामकर ,उसे डायेरेक्टर ऑफ़िस के सामने वाले बाग में ले गया। जहाँ गुलाब के फूल खिले हुए थे। अवनी  को उन फूलों का स्पर्श  कराते हुए मैंने उसे छायावाद के कवि माखन लाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा की पंक्तियाँ" चाह नही, मैं सुरबाला के घहनो में गूंथा जाऊँ, चाह नही मैं विधप्यारी को लल चाऊँ.... हे वनमाली देना मुझे उस पथ पर फेंक,मातृ भूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ पर जावे वीर अनेक",अवनी मुझे देख रही थी और वो खामोश थी । खामोशी अधिकता के पश्चात आती है और अधिकता तो संघर्ष से या संघर्ष के समय मिलती है। अवनी खुश थी। शायद उसे पुष्प की अभिलाषा समझ आ गयी थी, जिसके आगे उसकी अभिलाषा बहुत ही छोटी थी। 

जब हम किसी की ख्वाहिश के लिए अपने ख्वाहिश को भुला देते है। उस दिन प्रकृति का एक हिस्सा बन जाते है। क्युकी देने की भावना ही तो प्रकृति है। थोडी देर बाद हम लोग कैंटीन पहुँच गये। आज कैंटीन में केक और लड़को की जेब दोनो  कट रही थी। मगर फिर भी चारों तरफ खुशी का माहौल था। मगर अवनी इन सभी से अलग थी जो रुपयो के मामले मे बिल्कुल निष्पक्ष व्यवहार रखती थी। हमारी इसी बात पर तो झगड़े होते थे कि इस बार बिल में पेय करता हूँ पर अवनी अपना हिस्सा नही देने देती थी किसी को। शायद उसे लगता था कि किसी के बिल को चुकाने से हम उसके दिल के करीब हो जाते है पर अवनी तो मेरे करीब पहले से ही थी। समोसा और पेस्टीज खाने के बाद हम चल दिये, लेक्चर लेने पर अवनी ने कहा"स्वप्निल चल यार लंका होते हुए,अस्सी घाट चलते है, मैंने सिर हाँ में हिला दिया और हम निकल पड़े अस्सी घाट की ओर..... 

.... #जलज कुमार राठौर

Monday, 30 November 2020

तुम्हारा स्कार्फ




यार कॉमरेड,

मुझे नही पता क्यों उस वक्त तुम मुझे अपने दिल की हर बात बताती थी,और मैं भी बेफिक्र होकर अपने सारे राज तुम्हारे दरमियाँ खोल देता था। मुझे नही पता हमारे दरमियाँ क्या रिश्ता था पर कुछ तो था। वरना यूँ तुम्हारा मेरे लिए और मेरा तुम्हारे लिए इंतजार करना यूँ ही तो न था,घने कोहरे के बीच ,यूँ कड़कडाती सुबहों के बीच, तुम्हे देखना मेरे लिए किसी तापीय उष्मा से कम ना था। यूँ तुम्हारे साथ ,साईकिल होते हुए भी पैदल चलना मेरी आदतों और ख्वाहिशो में शुमार हो चुका था। हमारे बीच की वो साईकिल उस प्रतिरोध की तरह थी जो किसी चालक में तापीय उष्मा उत्पन्न करती है।वैसे वो तुम्हारा मधुवनी कला वाला रंगबिरंगा स्कार्फ लगा कर जब तुम आती थी। तो मै सोचता था। क्या तुम्हारा स्कार्फ मुझसे भी खुशनसीब है पर सर्दी बीतने का बाद गलत फहमी धीरे धीरे दूर हो गयी थी। वास्तव में सर्दियाँ प्रेम के लिए महत्व पूर्ण मौसम है।ये मौसम आपके धैर्य और आपके संस्कारों की परीक्षा लेता है। उसे घने कोहरे में ना जाने कितनी दफा हमारे दस्तानो से सुरक्षित ,हाथो का स्पर्श हुआ और तुमने हर बार मुझे देखा था। एक विश्वास था। तुम्हारी आँखों में मेरे लिए ,जो मैं अक्सर देखता था। जब तुम सिर्फ खामोश हो कर, मेरा हाथ अपने हाथ में थाम लेती थी। बस उसी विश्वास को कायम रखने के लिए के लिए मैं इंतजार करता था। तुम्हारा उस चौराहे पर जहां से हमारे रास्ते अलग होते थे।ताकि रात होने से पहले हम साथ में घर जा सके, वरना मालूम मुझे भी था ,कि एक दिन मैं भी तुम्हारे लिए उस मधुवनी कला वाले स्कार्फ जैसा हो जाऊंगा। जब तुम्हारी उम्र रूपी सर्दी का मौसम बदलेगा पर सच में मैं नही जानता था कि सब कुछ मालूम होते हुए भी मैं तुमसे इतना प्रेम क्यों करता हूँ। 

तुम्हारा दोस्त

........ #जलज राठौर

#चिराग_बाती....

 #चिराग_बाती....

"#दिवाली का त्यौहार सभी की जिन्दगी में खुशियाँ और तोहफे लेकर आता है। मुझे भी एक नायाब तोहफा दिया था उस खुदा ने #उससे उस हसीन मुलाकात का..

घर में माँ लक्ष्मी की पूजा सम्पन्न होने पर माँ ने कहा "चिराग इन दियो को छत पर रख आओ। "

आज के दिन मैं एक सस्कांरी बेटा था। इसी लिये मम्मी की पहली आवाज पर ही दियो से सजी थाली मेरे हाथ में थी। मैं छत पर पहुँच कर दियो को एक करके सजा रहा था। तभी नजर  घर के पीछे वाले घर पर पडी।मेरी हमउम्र एक लड़की जिसने गुलाबी साडी पहनी हुई थी।  बार -बार एक दिये को दूसरे दिये के सहारे जलाने की कोशिश कर रही थी। वो दिया तो नही जल रहा था मगर एक आग इस दिल मे जरूर प्रज्ज्वलित होने लगी थी। हो भी क्यो ना वो बार बार अपनी जुल्फो को कानो तक का रास्ता जो मुकम्मल करा रही थी। सच बताऊँ तो मेरी दीवाली तो बन चुकी थी। मैं धीरे से उसके पास गया और दोनो हाथो से उसके दूसरे दीपक को सहारा दिया। वो जल उठा। वो लडकी खुश हो गयी और थैंक्स बोल कर चलने लगी, मैने पूछा आपका नाम क्या है। वो बोली "जिसके बिन आप अधूरे है। मिस्टर चिराग ठाकुर.."बाती".

उस वक्त मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी और मैं अपने बचपन की पुरानी यादो में डूब चुका था। क्या वही बाती....जब छत से नीचे आकर मम्मी से पूछा तो मम्मी ने कहा हाँ बेटा ये शर्मा अकलं की बेटी #बाती है। जिसके साथ तू बचपन में खेलता था और स्कूल जाता था। अपने नाना जी के घर से आज दस साल बाद आयी है। वही पढकर ENGINEERING कर रही है। बस फिर क्या चेहरे पर जो मुस्कान थी वो मेरी पहली मोहब्बत की पहिचान थी। माँ ने कहा चिराग, बाती के घर मिठाई दे आओ ...मैंने अलमारी से एलबम में से हमारा पुराना फोटो निकाला और उसके पीछे अपना नम्बर लिख कर पैक करके बाती के  घर दौडकर जाने लगा तो माँ ने आवाज देते हुए बोला "मिठाई तो  ले जा"। वैसे तो बाती का  घर मेरे घर से दूर ना था पर ना जाने क्यूँ आज ये मीटरो की दूरी मीलो सी लग रही थी। मैंने बाती के घर के सामने पहुँच कर खुद को संभाला फिर डोर वेल बजायी। बाती ने दरवाजा खोला उसके चेहरे पर एक हँसी थी। पल भर के लिये मुझे ऐसा वो मेरी जिन्दगी है। अक्सर होता है प्रेम में होने पर जब हम मुस्कानों के सहारे प्रेम व्यक्त करते हैं। थोडी देर में अन्दर से आन्टी की आवाज आयी बाती कौन आया है। 

बाती बोली "मम्मी.....चिराग"।

आन्टी ने मुझे अन्दर आने को कहा और मिठाइयों से सजी टेबल पर बैठा दिया। 

मिठाईयो की मिठास के साथ हम लोग पुरानी मीठी यादो का स्वाद लेने लगे। 

मैं बाती और मेरी बचपन की फोटो को बाती से छिपा रहा था आन्टी से, लेकिन बाती मेरी हरकतो को महसूस कर रही थी। मैंने आन्टी को हमारे परिवार की तरफ से दीवाली की शुभकामनाये दी और पैर छूकर चलने लगा। 

आन्टी ने कहा "बाती चिराग को गेट  तक  छोड आओ।" मैं और बाती गेट तक आ चुके थे। मैंने हिम्मत नही कर पायी कि वो फोटो उसे दे दूँ। मैं अपने घर की ओर वापस चलने लगा।

तभी बाती बोली "ओय चिराग मेरा गिफ्ट तो देते जा" मैंने दौडकर उसे गले लगा लिया। उसने भी मुझे अपनी बाँहो में भर लिया था उस वक्त मुझे दुनिया की हर चीज खाली लग रही थी। आस पास के शोर को देख हम एक दूसरे से अलग हुए।बाती ने मेरे हाथ पर अपना नंबर लिखा फिर मैने उसे हमारे बचपन वाली वो फोटो दी और घर आकर उसे फोन लगाने बैठ गया। दो काल के बाद किसी ने नही उठाया। लगभग एक घंटे बाद मेरा फोन बजा। मैंने उठाया उधर से  आवाज आयी "चिराग?"। 

बस फिर  क्या हमारी बचपन की पुरानी यादो की किताब का हर पन्ना हम पलटने लगे 

रोज हम बाते करते बीते वक्त की।पुराने किस्सों की। 

आज जब फोन किया तो बाती थोडी उदास थी। वो बोली चिराग कल में नाना जी के यहाँ वापस जा रही हूँ।मेरी सारी खुशी गम मैं बदल गयी। 

बाती से मैंने कहा "मुझे तुमसे कुछ कहना है। " बाती ने कहा बोलो पर मैं उस वक्त हिम्मत न कर पाया और काॅल कट गयी। 

मैं सुबह लेट उठा तो देखा रूम में सूरज की रोशनी मेरे कमरे में थी। बाती सोफे पर बैठी थी। मैं बोला "अरे! बाती तुम तो नाना जी के यहाँ जा रही थी,गयी नही। वो बोली तुम कुछ  कहना चाह रहे थे कल,ल इसलिए सोचा तुमसे बात करके ही जाऊँ। मैंने बोला "हाँ बाती बात तो करनी है तुमसे  और मैंने अलमारी से वो अगूँठी निकाल ली जो माँ ने दिवाली गिफ्ट में बाती को देने के लिये दी थी। मैं बाती के पास आकर घुटनो तले बैठकर उसकी हथेलियों को थाम उसकी आँखो में देखकर बोला बाती "I love u"

बाती के आँखो से आँसू आ गये थे। पहले वो बोली "कल ही बोल देते यार फिर 

बोली चिराग "आई लव यू टू यार "

पर सोच ले, बाती  सिर्फ दिवाली तक ही चिराग को रोशन करती है। मैने हां मैं सिर हिलाया और उसका हाथ उसे अगूँठी

पहनाने के लिये थामा तो वो मेरे सामने से ओझल हो गयी। मुझे कुछ समझ ना आया मैं रूम से दौडकर बाहर आया तो देखा माँ घर पर नही है। रामू काका ने कहा वो शर्मा जी के घर गयी है। मैं दौडकर शर्मा अंकल के घर गया। माँ को देखा और बोला माँ बाती अभी घर आयी थी। मेरे छूते ही वो गायब हो गयी। माँ ने मुझे अपनी बाँहो मे पकड कर, सामने खामोश सोती बाती को दिखाया। मेरी आँखो के आँसू थम गये। 

माँ ने बताया "आज सुबह नाना के घर जाते हुए बाती का एक्सीडेन्ट हो गया. सच में बाती चिराग को दिवाली तक ही रोशन करती है। आज भी चिराग बिन बाती सा बुझा हुआ है।....

.....#जलज_राठौर "इटावा"

Wednesday, 14 October 2020

तलाकशुदा दोस्त 💔


 


सुनो यार, 

किताबों के पन्नो को पलटते हुए आज तुम्हारे साथ खिचवाई पुरानी तस्वीर मिली। उस देख एक बात समझ आ गई कि ये जरूरी नही जो हमारे साथ तस्वीर में होते हैं। वो ताउम्र हमारी  तकदीर में भी हों। वैसे बहुत अरसा बीत गया है तुम्हें जी भर निहारे हुए। मुझे नही पता था तलाक एक हँसते खेलते रिश्ते को राख बना खाक कर देता है। सच बताऊँ यार अब थक गया हूँ,जीवन की इस भाग दौड़ से।अब लगता हैं कि रख दूँ तुम्हारे आँचल में अपना सिर और तुम अपनी उंगलियों की पोरों को मेरे बालों के बीच बने रास्ते में भटकाओ। अब तो कोई उम्मीद भी नही है।हमारे साथ आने की पर ना जाने क्यूँ मन करता है। कि हम फिर मिलें,अंजान बनकर जैसे हम मिले थे कॉलेज के ग्राउंड में।हमने प्रेम करते वक्त और शादी करते वक्त कभी सोचा ही कहाँ था अपने अलग होने विषय में। काश उस रोज तुम्हें रोक लेता मैं अपने जीवन से दूर जाने से। जिन चंद पन्नो में प्रेम पत्रों का रूप बनकर हमने मिलाया था। आज वही चंद पन्ने तलाक के कागज बन हमें अलग कर रहें हैं। सुनो फिर मिलते हैं ना। पूर्व पति पत्नी नही बल्कि वो ही 10 साल पुराने वाले दोस्त बनकर.....

..तुम्हारा तलाकशुदा पति..... 

... #©जलज कुमार


Saturday, 10 October 2020

वचनवद्ध पति... 😘



 



 सुनो प्रिय, 

ख्वाहिश तो हमेशा से ही थी कि तुम्हारे साथ हनीमून पर बाली जाउँगा। लेकिन जिंदगी की उलझनो ने इस छोटी सी ख्वाहिश को भी तुम्हारे कानो की बाली और होठों की लाली तक समेट दिया। चाहता तो मैं भी था कि तुम्हारे साथ सूरज को सांझ का होते देखूँ  और तुम्हारे हाथों में हाथ डाल समन्दर की लहरों को चिडाऊँ। लेकिन चाहतों का पूरा होना आसान कहाँ होता है। तुम जो मुझे सर्दी होने पर काड़ा बनाकर देती हो सोचा था कभी कुल्लू या मनाली में ऐसे ही तुम्हारे संग पिऊंगा  ये काडा।लेकिन जीवन की उलझनों ने मेरे अंगिनत सपनो के बागों को उजाड़ दिया है। लेकिन तुमसे वादा करता हूँ। हवाई जहाज से अपने शहर  को देखने का तुम्हारा सपना एक दिन जरूर पूरा करूँगा। मुझे पता है तुम समझती हो मुझे तभी तो सालों  साल गुज़ार देती हो मायके से मिली एक या दो साड़ियों में। लेकिन इस बार वादा रहा तुमसे की करवाचौथ को तुम्हे अपना आसमां जरूर बनाऊंगा। ....तुम्हारा ....वचनवद्ध प्रिय

.. #जलज कुमार


एक वाजिब वजह.... ❤

 प्रिय कॉमरेड, 


  सुनो यार, 

जीवन के इस पड़ाव पर आज तुम्हारी कमी खल रही है।  मुझे नही पता हर रोज क्यूँ तुम्हारा ख्याल अक्सर मेरे ख्याल  में आ जाता है। लेकिन आज तुम्हारी याद आने की मेरे पास एक वाजिब वजह है। तुम जो मेरी हर खुशी का ख्याल रखती थीं। न जाने क्यूँ अब जानबूझ कर मुझसे नाराज हो। सच मैं नहीं बर्दाश्त होती एक छोटी से भूल की इतनी बडी सजा। शरीर से आत्मा को छीन उससे आत्मीयता दिखाने का कोई महत्व नही रहता। व्यक्ति खुद को तो कुछ समय बाद बदल लेता है। लेकिन मुझमें तो तुम आज भी विद्यमान हो जैसे दोपहर में चाँद,जन्म और मरण के इस भँवर में फंसे मानव को एक प्रेम ही तो आनंदित करता है। बढती उम्र के इस पड़ाव के साथ मैं हर एक क्षण तुमसे कोसों दूर जाता हूँ। मुझे नही पता हम किस चौक या चौराहे पर वापस मिलेंगे।क्युकी मैने मंजिलों से उम्मीदों को रखना छोड़ दिया है। हाँ रास्तों पर थोड़ा भरोसा आज भी है।मुझे नही पता तुम दिन भर में कितनी हिचकियाँ लेती हो पर ये जरूर है कि मेरी कई रातें जरूर  तुम्हारा स्मरण कर सिसकियों में बीतीं हैं। पता नही तुम्हें उस वजह की वजह पता है कि नही जिस वजह से आज  मुझे तुम्हारी कमी खल रही है।खैर छोड़ो..... 

सिर्फ तुम्हारा,

... #जलज राठौर


Friday, 9 October 2020

आँसुओं से भरी मांग

 


आँखों में आँसू तुम्हारी, 

आएंगे उस दिन जरूर, 

कोई गैर तन जब , 

होगा तुम्हारी साँसों में मगरूर, 

हस्त रेखाओं को अपनी

मैं दोष देकर जी भी लूंगा, 

दर्द के आँसू उंजरी भर भी लूंगा,

मगर सोचता हूँ कैसे तुम

रह पाओगी मेरी बाहों से दूर,

आँखों में आँसू तुम्हारी, 

आएंगे उस दिन जरूर,

जब कोई अनचाहा शक्स

भरेगा तुम्हारी मांग में सिंदूर,

जब भी देखूँगा अब तुम्हें, 

सोलह  श्रृंगार तुम्हारे चिढायेंगे मुझे 

मुलाकातों मैं हमारी, 

पास होकर भी हम होंगे दूर, 

आँखों में आँसू तुम्हारी, 

आएंगे उस दिन जरूर,

.... #जलज कुमार


Thursday, 8 October 2020

मोहल्ले वाले बड़े भैया,



 मोहल्ले वाले बड़े भैया, 



Part_१

शर्मा जी के बड़े बेटे को, मेरे साथ के और मुझसे छोटे मोहल्ले के सभी लड़के बड़े भैया कहकर बुलाते थे। बड़े भैया बचपन से ही पढ़ने में तेज थे। अपने स्कूल में टॉप करने के बाद उन्होंने किसी सरकारी कॉलेज से इंजीनियरिंग की थी। उस रोज 28 जून का दिन था। जब मेरा प्रवेश शहर के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में हुआ था।मैं भैया को बताने उनके घर पर गया था। भैया अपने छत वाले रूम में लेटे हुए थे। मुझे देख बोले "क्या टॉपर कौन सा कॉलेज मिला इंजीनियरिंग में ", " भैया अपना एच. बी. टी. आई. ही मिल गया " मैंने बोला। भैया खुश होते हुए अपने कमरे की टंगी तस्वीर की ओर देखने लगे और बोले "कभी मैंने भी इसी कॉलेज की परीक्षा में टॉप किया था" फिर उदास होकर मेरे पास बैठे गए।

तुझे पता है टॉपर मैं बचपन से पढ़ने में होशियार था। हमेशा क्लास में तेरी ही तरह टॉप मारता था। मेरी ही क्लास की एक लड़की थी। बहुत पसंद करता था मैं उसको और वो भी करती थी। पता है यार जीवन में कुछ पसंदे सिर्फ पसंद ही बनकर रह जाती हैं।

पार्ट-२

उसके साथ कभी वक्त का पता ही नहीं लगता था। इन्ही हँसी और मुस्काराहटो में कब कॉलेज ख़तम हो गया पता ही नही चला। वो हमेशा कहती थी कि "यार बनना तो IAS ही है।" बस उसी दिन से उसके सपने को अपना बना लिए थे। दिन रात मेहनत करते थे। इस चक्कर में उससे बात भी बन्द हो गयी थी। धीरे धीरे हमारे बीच सब खत्म सा हो गया। यार टॉपर जिसके बिना एक मिनिट भी मन नही लगता था। आज उसके बिना २ साल गुजार दिये हैं। आज जब पीछे देखता हूँ तो मेरे साथ कुछ भी अपना नही है। सपना भी किसी और का है। ......... 

..... #जलज कुमार

 ...... 

Wednesday, 7 October 2020

कैंसर वाला तारा.. ❤😔

 


सुनो यार, 

आसमां में जब भी देखता हूं तो टिमटिमाते हुए तारों में तुम्हारा अश्क दिखाई देता है। वो छत की मुंडेर पर मेरे साथ रात में बैठकर तुम ही तो कहती थी कि "मेरे इस दुनियाँ में ना होंने पर तुम आसमां में मुझे ढुंढ़ना और जब भी कोई तारा टिमटिमाए तो समझ जाना मैं तुम्हें देख पलको को झपका रही हूँ" और मैं तुम्हारे कंधे पर सिर रख उदास हो जाता था। यार कभी कभी लगता है कि यह अच्छा ही है कि हमें हमारी मौत का पता, पता नहीं होता है। वरना हम में से ना जाने कितनो ने रास्तों पर चलने का हौंसला ही न किया होता। लेकिन मेरे संग चलने का तुम्हारा ये हौंसला कैंसर जैसी बीमारी के भी हौंसले पस्त कर देता था। तुम्हारी जुल्फों में उंगली फंसा अपनी उलझने दूर करने वाला मैं तुम्हें बिन बालों के देख अंदर ही अंदर घुटन महसूस करता था।जिस दिन तुम मुझे छोड़ कर गयीं थी उसी दिन से मैंने आसमां में टिमटिमाते तारों से दोस्ती कर ली थी।इस उम्मीद में कि तुम अपना ये वादा तो पूरा करोगी।

... #जलज 

"क्लीनिक प्लस वाली"

 प्रस्तावना: ये कहानी छोटे से कस्बे में रहने वाले दो 16 साल के बच्चों की है। प्रेम की अलग अलग परिभाषाओं की सहायता से समाज के बनाए रास्तों पर...