Sunday, 27 September 2020

मेला और तुम....

 सुनो कॉमरेड, 

मुझे नही पता कि दर्द में काँधे का मिलना कितना सुकूँ देता है। मुझे नही पता कि कैसे एक सोलह साल के लड़की शादी के बाद एक औरत बन जाती है। मुझे नही पता कि प्रेम में पड़ा हर आशिक क्यूँ कविताओं को लिखता है। मगर जहाँ तक समझ पाता हूँ तो पता चलता है कि हर परिवर्तन की एक वजह होती है।तुम्हारे बदलने की भी कोई वजह रही होगी जो शायद मेरे लिए बेवजह रही होगी।मुझे आज भी याद है वो दिन जब तुम मेले में आसमानी झूले पर मेरे साथ बैठी थी। आँखे बंद कर जो विश्वास तुम मुझ पर जताती थी। वो शायद किसी ने आँखों के खुले होने पर भी नहीं जताया होगा। उस आसमानी झूले में बैठ मैं अपने जीवन के दो सबसे अजीज हिस्सों को देख खुश होता था। एक तुम और एक ये मेरा शहर।वैसे वो शहर जहाँ हम अपना बचपन बिताते हैं। कभी हमसे भुलाया नही जाता वैसे ही बचपन के प्यार को भी हम नही भुला पाते।बस यही कारण है कि तुम मेरी यादों से बिसर(भूलकर) कर नहीं जाती कहीं.... 

. .......#जलज कुमार

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