प्रस्तावना: ये कहानी छोटे से कस्बे में रहने वाले दो 16 साल के बच्चों की है। प्रेम की अलग अलग परिभाषाओं की सहायता से समाज के बनाए रास्तों पर चलकर वो अपनी मंजिल तक जाना चाहते हैं।देखिए कितनी दूर तक चलता है ये साथ। आप छोड़िए ना इस कहानी के नायक पार्थ और नायिका प्रार्थना का हाथ।.#जलज कुमार
* क्लिनिक प्लस वाली*
सर्दी की सुबह कोहरे से ढकी हुई थी।तभी पार्थ की साईकिल किसी से टकराई।"देख कर नहीं चल सकते"एक प्यार भरी आवाज पार्थ को सुनाई दी।पार्थ जब तक कुछ जवाब देता,तभी उसके सामने गुलाबी गालों पर गुस्सा लिए एक लड़की खड़ी थी।पार्थ कुछ बोलने की अवस्था में नहीं था।वो देख रहा था चश्में में दिखने वाली दो बड़ी आंखों और इतनी सर्दी में भी खुले बालों वाली लड़की को।बालों की खुशबू को सूंघ पार्थ ने बेशर्म होकर पूछा, क्लिनिक प्लस ना। लड़की बोली ,"क्या?"।"अरे क्लिनिक प्लस सैंपू से बाल धोएं हैं ना" पार्थ ने बोला। लड़की ने नजरों को झुकाते हुए हामी में सिर हिलाया। पार्थ बोला "मुझे बहुत पसंद है, इसकी खुशबू। लड़की जो गुस्से से लाल थी,अब मुस्करा रही थी।"हाय , आई एम पार्थ ठाकुर "पार्थ ने लड़की की तरफ हाथ बढ़ाकर बोला।ये छोटे शहर के लड़को की खासियत होती है, कि वो लड़की के सामने अंग्रेजी जरूर बोलते हैं।शायद उन्हें ये कूल लगता है।"हाय, आई एम प्रार्थना यादव" प्रार्थना ने उत्तर दिया।उसके बाद दोनो ने एक दूसरे को सॉरी बोला और अपने अपने रास्ते निकल गए।सच में,किसी से टकराना कभी कभी हमें उस शख्स से ऐसे मिला देता है।जैसे राही को रास्ते मिलाते हैं,मंजिल से।
सुबह साइकिल की टक्कर होने के कारण आज स्कूल के बाद पार्थ फिजिक्स की ट्यूशन पैदल ही गया था।शहर के प्रतिष्ठित अध्यापक होने के कारण उपाध्याय जी पर संपूर्ण शहर के स्कूल के बच्चे आते थे।सच बताएं तो फिजिक्स की ट्यूशन में बच्चों की केमिस्ट्री अच्छी हो जाती थी।पार्थ आज पैदल आने की वजह से थोड़ा लेट हो गया था।इस लिए वो उपाध्याय जी की ट्यूशन के दरवाजे पर बैठ गया था।उपाध्याय जी वैसे तो लड़के और लड़कियों में कोई भेद नहीं करते थे।लेकिन हां वो अपनी ट्यूशन में लड़कियों को सदैव आगे बैठाते थे। उपाध्याय जी बता रहे थे," जब भी किसी चालक को फ्लक्स या फ्लक्स को कोई चालक काटता है तो विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।" तभी पार्थ चिल्लाया ,"काट दिया"। सब लोग पार्थ की तरफ देख रहे थे।उपदेशिका जिसने आज आज ही शाम के बैच में ज्वाइन किया था। दरवाजे से एंट्री मारी और उसका पैर पार्थ के पर पर रख गया। सॉरी पार्थ ,बोलकर वो आगे जाकर बैठ गई।उपाध्याय जी ने क्लास को मुद्दे से भटकाते हुए बोला," दरवाजे पर बैठोगे तो इसरो में चौकीदार बनोगे,थोड़ा अंदर बैठोगे तो शायद कुछ भला हो जाए।तभी पीछे सी आवाज आयी,"सर फिर तो ये प्रधानमंत्री भी बन सकता है।पूरी क्लास और उपाध्याय जी हंस रहे थे।परंतु पार्थ,देख रहा था प्रार्थना को।जैसे बच्चे देखते हैं,आसमान में इंद्रधनुष को।
शाम के छः बज चुके थे।उपाध्याय जी के ट्यूशन की छुट्टी हो चुकी थी।सभी विद्यार्थी अपनी अपनी साइकिल से निकल चुके थे।पार्थ भी पैदल अपने घर की ओर जा रहा था।तभी प्रार्थना की आवाज आई,"पार्थ,रुको यार"। वैसे लड़कियों के इस "यार" शब्द ने ,ना जाने छोटे कस्बों के कितने लड़कों को प्यार में पागल बनाया। उत्तर भारत में सर्दी से भरी शामें हल्के कोहरे की वजह से धुंधली हो जाती हैं। ये धुंधली शाम अक्सर दो प्रेम करने वालों के लिए एक नए सवेरे सी होती हैं। पार्थ अब चल रहा था,अकेला नहीं, प्रार्थना के साथ में।"वैसे क्या प्लान है तुम्हारा ,ट्वेल्थ के बाद"प्रार्थना ने पार्थ से पूछा। पार्थ ने कहा," यार वैसे सपना तो आर्मी में जाना है।लेकिन फिलहाल तो ट्वेल्थ में अच्छे मार्क्स लाना है"।प्रार्थना ने कहा,"यार मार्क्स तो मुझे भी अच्छे लाने हैं लेकिन ट्वेल्थ में नहीं नीट में।पार्थ ने पूछा,"अरे तुम बायोलॉजी से हो क्या"। "क्यों कोई शक है क्या,"प्रार्थना ने कहा।पार्थ बोला मुझे लगा कि शायद तुम गणित में हो। "गणित में तो नहीं लेकिन हां पार्थ बाबू ,तुम्हारे ही कॉलेज में हूं वैसे मैं" प्रार्थना ने उत्तर दिया। तब तक तिराह आ चुका था।जहां से उन दोनो के घर के रास्ते अलग अलग थे। सच बताऊं तो कभी कभी लगता है।जो परिस्थियों से हार नहीं मानता उसके लिए "हार" उलट कर खुद "राह"बन जाती है।
छोटे कस्बों में सर्दियों की सुबहों में साईकिल की घंटियों की आवाजें ,चिड़ियों की आवाजों से ज्यादा होती हैं। ब्रेड,बथुआ,साग,मैथी को बेचने वाले, सर्दी को एहसास कराते हैं कि पेट की आग के आगे आज भी वो तुच्छ और निरीह है।विद्यार्थी भी सर्दी की आंखों में आंखें डालकर उससे कहते हैं कि वो सिर्फ परीक्षा के पेपर को ही देख कर कांपते हैं।लेकिन आज सर्दी इतनी तेज थी की पार्थ अपनी साइकिल के हैंडल को छोड़कर,अपने दोनो हाथ अपनी जैकेट की जेब में डालकर कोचिंग को आ रहा था।थोड़े दिन ही बचे थे बोर्ड के पेपर में, इस लिए प्रार्थना भी आज सुबह वाले बैच में रिवीजन करने के लिए ट्यूशन आई थी।गुप्ता जी केमिस्ट्री के बहुत ही पुराने अध्यापक थे।उन्हे केमिस्ट्री ऐसे आती थी जैसे हमें फिल्मी गाने आते हैं।आज पीरियोडिक टेबल का रिवीजन होना था। बच्चों की भीड़ बैठने के बाद भी पार्थ और प्रार्थना दोनो के बीच इतनी दूरी थी।जितनी दूरी ये समाज अक्सर छोड़ देता है।लड़के और लड़कियों के बीच में।चाहे वो स्कूल की सीटों के बीच हो या किसी सरकारी दफ्तर में लगी लाइनों के बीच।लेकिन अब पार्थ और प्रार्थना इस दूरी को कम कर पास आ रहे थे।जैसे लहरें किनारों के करीब आती हैं।तभी गुप्ता जी बोले," पीरियोडिक टेबल में s ब्लॉक के ग्रुप को याद करने के लिए "Hari lal nana Kal Raat car se farar ", अर्थात हाइड्रोजन(H),लिथियम(Li) ,सोडियम (Na), पौटेशियम (K), रूबीडीम(Rb),सेसियम (Cs), फ्रैंशियम (fr)। इन्हें एलकाली मेटल भी कहते हैं। सभी बच्चे इस ट्रिक से खुश थे।लेकिन पार्थ अपने हाथ के दास्तानों को उतार कर ,प्रार्थना के हाथों को थाम ऊष्मा स्थानांतरण का प्रयोग कर रहा था।केमिस्ट्री की टयूशन में बच्चे अक्सर फिजिक्स का रिवीजन कर लेते थे।
सुबह का वक्त था।कोहरे को चीरती हुई आवाज आई,"जे लौंडे जो लफंगियाई करत रहे हैं,अब समझ आईए इन्हें। 5 दिन बाद इनके पेपर जो हैं"।पार्थ ने देखा सामने वाले मेहता अंकल जो उसके ही स्कूल में कला पढ़ाते थे।ये बोलते हुए ,पार्थ के बाबा के पास आकर तापने लग गए।पार्थ ने मन में बड़बड़ाया,"इनकी तो पहले से ही जली रहती है,फिर क्यों ताप रहे हैं।पार्थ उनके ताने से बचने के लिए अपने कमरे में चला गया।सुबह के 9 बजे थे।स्कूल के प्रांगण में पार्थ ,प्रार्थना को खोज रहा था।तभी पीछे से ,प्रार्थना ने अपने ठंडे हाथों से पार्थ की आंखे बंद कर लीं।पार्थ ने प्रार्थना के हाथों को हटाते हुए बोला,"यार वो मेहता देख लिया तो मोहल्ले में बवाल करवा देगा"।तभी प्रधानाध्यापक चौधरी जी ने अनाउंस किया," आज हाफ डे के बाद 10 वीं और 12 वी कक्षा के विद्यार्थी अपना प्रवेश पत्र ले लें।कल से इन लोगों की क्लासें नहीं लगेंगी।वो अब घर से ही रिवीजन करके पेपर देने जाएं। बारहवीं के सभी विद्यार्थियों के चेहरे ही उतर गए थे।वो स्कूल जिसके मान सम्मान के लिए वो शहर के अन्य प्राइवेट स्कूल के बच्चों से लड़ जाते थे। उस स्कूल ने उन्हे पराया कर दिया था। लड़के और लड़कियों का परीक्षा का सेंटर अलग अलग था।इसलिए अब इन सभी का दोबारा मिलना भी नामुमकिन सा था।सब एक दूसरे को जी भरके देख रहे थे। उस दिन,वो सब एक साथ आखिरी बार मिल रहे थे।आंखों में नमी लिए प्रार्थना ने पार्थ से पूछा," फिर कब मिलेंगे?। पार्थ ने उसको ढांढस बंधाते हुए कहा,"पागल अभी पेपर शुरू होंगे,खत्म होंगे और तेरा पीछा तो मैं कभी ना छोड़ूं मेरी भूतनी"।प्रार्थना हंस कर बोली,"05688-....... ये मेरे घर का लैंडलाइन नंबर है,अब तू यहीं से मुझ पर लाइन मारना।पार्थ ने "क्लीनिक प्लस " के नाम से प्रार्थना का नंबर सेव कर लिया था।
मार्च महीने का पहला दिन था।हल्की सर्दी और तेज धूप के साथ मौसम सुहाना प्रतीत हो रहा था। यूपी बोर्ड्स की परीक्षाए आज हिन्दी विषय की परीक्षा के साथ शुरू हो रही थीं।तभी पार्थ का मोबाइल बजा।पार्थ बिना स्क्रीन देखे मोबाइल को सीधे कान से लगाकर बोला,"हेलो कौन?"।"अच्छा अभी से भूल गए, वाह पार्थ वाह",प्रार्थना ने तपाक से बोला। पार्थ ने उदास होते हुए कहा,"नहीं यार बस ये हिंदी के पेपर का डर है।सुन,ये हिन्दी बिल्कुल हमारी मम्मी जैसी है। प्यारी तो बहुत है, लेकिन समझ नहीं आती। चल ये छोड़, ये बता तूने क्यों फ़ोन किया"।प्रार्थना ने परेशान होते हुए कहा,"यार , करुण रस और वियोग रस में समझ नहीं आ रहा।दोनो के उदाहरण एक जैसे ही हैं। इनमें अंतर कैसे करूं"।पार्थ ने कहां," देख करुण रस में बंदे का खेल हो जाता है,मतलब वो अपने शरीर को त्याग देता है। जबकि वियोग रस में दो प्रेम करने वाले सिर्फ अलग होते हैं और दोनो जिंदा होते हैं। जैसे : रावण का मेघनाद की मृत्यु पर रोना करुण रस का उदाहरण है और प्रभु राम का सीता जी की के हरण के बाद विलाप करना वियोग रस है। वियोग मतलब दोबारा योग हो सकने की परिस्थिति"।"मतलब मैं अभी वियोग रस से पीड़ित हूं"प्रार्थना ने कहा। पार्थ हंसते हुए बोला,"तू हास्य रस का उदाहरण है पागल।चल अब बाय ,पढ़ने दे"। प्रार्थना ने गुस्सा में कहा ,"ठीक है, बाय।
बारहवी के सभी पेपर होने के बाद पार्थ बहुत परेशान रहता।प्रार्थना से मिलने का कोई एक बहाना भी उसके लिए किसी उपलब्धि जैसा होता था।सोमवार का दिन था।पार्थ ने प्रार्थना को कॉल किया।तीन बार फोन लगाने पर भी किसी ने नहीं उठाया।पार्थ परेशान था इस लिए वो मोबाइल चलाने लगा।तभी उसके मोबाइल पर "27 अप्रैल को जारी होगा 12 वीं का परिणाम" ये नोटिफिकेशन आया।पार्थ पहले तो खुश हुआ,लेकिन जब उसे याद आया कि उसका केमिस्ट्री का पेपर अच्छा नहीं हुआ था।इस वजह से वो उदास हो गया।पार्थ ने कैलेंडर में देखा तो पाया सिर्फ दो दिन बाकी हैं रिजल्ट आने में। उसने तभी घर के बाहर से उसके बाबा को बोलते हुए। मेहता अंकल की आवाज "ठाकुर साहब रिजल्ट आयवे वालो है परसों बारहवीं को,सोच लेओ आगे का कराने है जा छोकरे को" सुनी।तभी पार्थ तिलमिला उठा।घर से बाहर आकर बोला,"अंकल सुनो हम बीटेक तो करियें ना,का है मोहल्ला में बहुत बेरोजगार वैसे ही भरे हैं"।मेहता जी के बीटेक किए हुए बड़े लड़के अर्थव मेहता की नाकामी को अपना हथियार बनाकर पार्थ खुश था।लेकिन उसने तभी देखा अर्थव ने ये सुन लिया था।पार्थ की ये खुशी उदासी में बदल गई।अर्थव भैया,मोहल्ले के वो बड़े भैया थे जिनका उदाहरण प्रत्येक घर में दिया जाता था।उनकी कामयाबी के लिए नहीं, बल्कि उनकी नाकामयाबी के लिए।
सच बात ये थी कि अर्थव का मन पढ़ाई से ज्यादा कविताओं और कहानियों में लगता था। उसकी कई कविताएं दैनिक अखबारों में छप चुकी थीं।लेकिन मेहता जी का मानना था।ये सिर्फ शौक के लिए अच्छा है लेकिन शौक पूरे करने के लिए किसी नौकरी का होना आवश्यक है। पार्थ उदास था।अर्थव भैया के विषय में ऐसा बोलना। उसे ग्लानि से भर रहा था।तभी उसका फोन बजा।मोबाइल पर "क्लीनिक प्लस वाली" लिख कर आ रहा था।पार्थ ने फोन उठाते हुए बोला,"कहां व्यस्त थी मैडम?"। प्रार्थना ने कहा,"वो आज नीट का पेपर था यार, वही देने गई थी।
पार्थ की आवाज से उदासी को भांप कर प्रार्थना ने उस से इसकी वजह पूंछी।पार्थ ने थोड़ी ही देर पहले हुआ वाकया प्रार्थना को सुनाया।"तुझे अर्थव भैया से माफी मांगनी चाहिए,पार्थ"प्रार्थना ने पार्थ से कहा।"ठीक है,मैं अभी जाता हूं,शायद वो मुझे मांग कर देंगे।आखिर बड़े भैया हैं। चल बॉय पागल"।"गलती का एहसास होना हमें माफी के काबिल बनाता है पार्थ, ठीक है, बॉय पगले" प्रार्थना ने कहा।पार्थ अर्थव भैया के घर की ओर चल दिया।
आज पूरे सात साल बाद पार्थ,मेहता अंकल के घर गया था।पार्थ को आज भी याद है जब मेहता अंकल ने शक लक बूम बूम देखते हुए पार्थ को अपने घर से भगा दिया था। ये बात तो है,बचपन में हुई बेज्जती,जवानी में मिले प्यार के धोखे से ज्यादा घाव देती है।पार्थ,अर्थव भैया के रूम के बाहर जाकर खड़ा हो गया था। अर्थव ने जब उदास पार्थ को अपने कमरे के बाहर खड़ा देखा तो उसे अन्दर आने का इशारा किया। पार्थ अपनी नजरों को झुकाए खामोश खड़ा था। अर्थव ने बोला,"क्या बात है पार्थ,आज तू हमारे घर पर कैसे"।"भैया वो सुबह मैं ज्यादा ही बोल दिया। मैंने सोचा ही नहीं की आपको कितना बुरा लगेगा" पार्थ ने अर्थव से कहा।अर्थव ने पार्थ की ग्लानि से भरी आवाज को भांपते हुए कहा,"पार्थ आज तुझे अपनी स्टोरी बताता हूं। जब मैं 10 वी में था तो मैंने पूरा जिला टॉप किया था।उसके बाद 11 वी में पापा ने खुश होकर मुझे मोबाइल दिला दिया और मेरा, वो कस्बे के सबसे महंगे वाले कॉलेज में प्रवेश करवाया।11 वीं के पहले ही दिन मुझसे स्कूल में एक लड़की टकराई थी।टकराने के बाद उसकी अकार्बनिक रसायन विज्ञान की किताब मेरी उंगली पर गिर गई थी। मेरी उंगली को फूंकते हुए वो इतना चिंतित थी,जितना चिंतित हम किसी अपने के लिए होते हैं।पूरी बारहवीं उसके साथ बीती।कभी लगा ही नहीं कि हम कभी अंजान थे। फिर उसका दिल्ली यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया।और मैं बिना प्लान के जी रहा था।घर वालों ने बीटेक करवाई लेकिन प्राइवेट जॉब नहीं करने दी। अब बस ये ,कलम घिस रहे हैं। शायद मेरे किस्मत की चिंगारी प्रज्जवलित हो जाए"।पार्थ समझ नहीं पा रहा था कैसे अर्थव भैया मेधावी छात्र होकर भी ,अपनी ही ख्वाहिशों के पात्र ना थे
पार्थ जब मेहता अंकल के घर से लौटा तो रात हो चुकी थी।
अर्थव भैया की प्रेम कहानी उसे लगभग अपनी सी लगी। पार्थ मन ही मन सोच रहा था। क्या सच में ,जिस से हम बेइंतहा प्रेम करते हैं वो एक दिन हमें भूल जाता है।जैसे मुसाफ़िर रास्ते भूल जाते हैं। उसने तभी प्रार्थना को कॉल किया। प्रार्थना की दादी ने फोन उठाकर पूछा,"हेलो,कौन"।
पार्थ ने खामोश रहकर फोन के कटने का इंतजार किया।एक बार और फोन बजा तो प्रार्थना ने फ़ोन उठाते हुए बोला,"हेलो,जी कौन"।"कल मंदिर पर मिलते हैं यार,"पार्थ ने कहा।प्रार्थना ने हामी भरते हुए शाम को मिलने के लिए कहा।"अरे! कौन है फ़ोन पर प्रार्थना,"दादी ने कमरे से आवाज़ देते हुए प्रार्थना से पूछा।"जी दादी कोई नहीं है",प्रार्थना ने उत्तर देते हुए कहा। झूठ बोलती लडकियां,अक्सर समझदार हो जाती हैं।
सोमवार का दिन था।अप्रैल का महीना गर्मियों के आगमन और सर्दियों गमन का मेल जोल होता है।इस लिए इस महीने दिन और रात लगभग बराबर होते हैं।मंदिर के पास वाले बरगद के पेड़ के नीचे पार्थ बैठा हुआ था।तभी प्रार्थना ने मंदिर में प्रवेश की।पार्थ को देखे बिना सबसे पहले वो मंदिर के बैठे प्रेम के मानक,प्रभु श्री राम के चरण स्पर्श करती है।पंडित जी,जो प्रार्थना को तबसे जानते हैं।जब वो अपनी दादी के साथ पहली बार मंदिर आई थी।"लो बिटिया प्रसाद लो और खूब तरक्की करो" पंडित जी ने कहा।
प्रसाद लेकर प्रार्थना पास वाले बरगद के पेड़ के नीचे बैठे पार्थ को प्रसाद देती है।"तो क्या हाल है,पागल लड़के",प्रार्थना ने पार्थ से पूछा।पार्थ ने धीमी आवाज में पूछा,"क्या हम भी अलग हो जायेंगे अब"। प्रार्थना ने पार्थ की भावनाओं को भांपते हुए बोला,"हमारा साथ होना और अलग होना सब नियत है पार्थ,बस हम इतना जरूर कर सकते हैं। कि इस हसीन वक्त को बिना अफसोस और शोक के खुशी खुशी बताएं। "अच्छा ,तो जो वादे हमने किए वो सब निराधार है क्या प्रार्थना",पार्थ ने पूछा।"पार्थ , हमें समझना होगा कि जीवन बचपन नहीं है जो पॉकेट मनी से चल जायेगा।इसको चलाने के लिए तनख्वाह ऐसे जरूरी है जैसे जीने के लिए सांस।यार हम अभी पढ़ेंगे,इतना कि हम अपनी जिम्मेदारियों का बोझ उठा सकें।अगर उसके बाद भी हम में प्रेम शेष रहता है तो हम विवाह करेंगे"प्रार्थना ने कहा।प्रार्थना को इतना समझदार होता देख पार्थ समझ गया था कि प्रेम तभी हकीकत में तब्दील हो पाता है।जब सपनो को हकीकत बनाया जाए। दोनो लोग मंदिर से घर की ओर निकल पड़े।रास्ते में मोमोज की दुकान पर पार्थ ने फ्राई मोमोज को छोड़कर। प्रार्थना की पसंद वाले, भाप वाले मोमोज खाए।किसी की पसंद का ख्याल रखना , उस से प्रेम करने की हमारी उत्सुकता को बढ़ता है। प्रार्थना ये सब देख रही थी और सोच रही थी, सच में प्रेम ,लड़कपन को जिम्मेदारियों में बदल देता है।
सुबह के छः बज चुके थे।पार्थ आज जल्दी उठ गया था।आज 27 अप्रैल को उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का परिणाम आने वाला था। बारहवीं की परीक्षाओं के बाद ये पहला दिन था जब पार्थ ने इतनी जल्दी उठ कर नहा लिया था। पार्थ का भविष्य आज के दिन पर निर्भर था।आज पार्थ बिल्कुल आदर्श बालक की तरह कार्य कर रहा था। उधर प्रार्थना भी आज सुबह जल्दी उठ कर अपनी दादी के कार्यों में हाथ बंटा रही थी। इन सब कामों में पार्थ इतना व्यस्त था कि उसे पता भी नहीं चला कब 12 बज चुके थे। तभी मेहता अंकल अपना सैमसंग का नया वाला फोन पार्थ के बाबा को दिखाते हुए बोले,"का ठाकुर साहब आज बो तुमायो नाती दिखाई नहीं दे रहो।देखो बाको परीक्षा को परिणाम भी आए गयो। अपने विद्यालय में सेकंड टॉप करो है अपने छोकरे ने"।आज ये शायद पहली बार था जब पार्थ ने मेहता अंकल के मुंह से पार्थ के लिए अपना शब्द सुना था।तभी पार्थ का फोन बजा।"ओय पागल तू तो टॉप ही मार दिया",प्रार्थना ने बोला।पार्थ ने प्रार्थना से पूछा ,"मेरी छोड़ तू बता तेरे कितने प्रतिशत बने"। "कहा था ना तेरा साथ नहीं छोडूंगी, फर्स्ट टॉपर हूं मैं भी"प्रार्थना ने कहा। कभी कभी किसी का हम से आगे निकल जाना हमें दुख से ज्यादा खुशी देता है।आज पार्थ खुश था। अपने लिए भी और उस से ज्यादा प्रार्थना के लिए।
शाम का समय था। तभी मोहल्ले में मीडिया वाले आ गए।मेहता अंकल से उन्होंने पुछा ,"ठाकुर साहब का घर कौन सा है"।मेहता जी उन्हें ठाकुर साहब के घर के पास ले जाते हैं।तभी पीछे से आवाज आती है,"ठाकुर साहब के घर के सामने ही है। अर्थव मेहता जी का घर।सभी लोग मेहता जी के दरवाजे पर भीड़ लगा लेते हैं।मेहता जी मीडिया वालों से अर्थव का नाम सुन परेशान हो जाते हैं। "अब क्या कर दिया इस बेरोजगार अर्थव ने," बोलते हुए वो घर के अंदर घुसते हैं। "बेरोजगार नहीं भाईसाहब बेस्टसेलर उपन्यासकार बोलिए"पत्रकारों की भीड से आवाज आई। तभी अर्थव घर से बाहर आया और उसने मीडिया द्वारा इंटरव्यू लेने वाली सीटों पर पहले मेहता जी को बैठाया।उनके ही पास वो खुद बैठ गया। "अर्थव जी आपको आपके उपन्यास "बेरोजगार प्यार" के लिए बधाई।लेकिन मेरा प्रश्न आपके पिता से है कि वो आज कैसा महसूस कर रहे हैं"। मेहता जी स्कूल की स्टेज पर भी जानें से डरते थे।आज पत्रकारों को देख आवाक थे।लेकिन उन्होंने माइक को पकड़ते हुए बोला,"आज जिसे आप अर्थव मेहता बोल रहे हो ।वो मेरे लिऐ सदैव एक नाकारा रहा। मैंने कभी कोशिश नहीं की इसे समझने की। अपने सारे सपने इस पर थोपे।लेकिन ये भी महान ही था।इसने कभी विरोध ही नहीं किया और मेरे थोपे हुए सपनो को पूरा करने के चक्कर में भूल गया कि इसके भी कुछ सपने हैं।लेकिन मैं आज खुश हूं कि इसने अपने सपनो को बुलंदियां दीं"।अर्थव की आंखें नम हो गईं थीं।पार्थ भी आज हमेशा मुस्कराते मेहता जी को गर्व और ग्लानि दोनो से परिपूर्ण देख रहा था।मेहता अंकल तभी बोले," इंटरव्यू आप लीजिए।हम आप सभी के नाश्ते का प्रबंध करते हैं"।कुछ ही देर बाद मेहता जी समोसे ,कोल्डड्रिंक और गोंद के लड्डू सभी में बंटवाने लगे।अर्थव भैया ने पार्थ के पास आकर उसे चार लड्डू और उसका बजता हुआ फोन देते हुए कहा,"क्लिनिक प्लस वाली के लिए भी रख ले"।
पार्थ के कंधे पर हाथ रखकर अर्थव भैया बोले,"प्रेम करना,लेकिन मोह ना करना"। क्योंकि किसी मोह हमें हमारे सपनो से अलग कर देता है। आज पार्थ पहली बार जीवन में बड़े भाई की अहमियत को समझा था।
बोर्ड के परिणाम आने के बाद कॉलेज वालों ने मेधावी बच्चों को अगले दिन स्कूल बुलाया था।सुबह सुबह पार्थ प्रार्थना से स्कूल के बाहर वाल,नीम के पेड़ की नीचे मिलता है। पार्थ उसे अर्थव भैया द्वारा दिए गोंद के लड्डू देकर, परीक्षा में अव्वल आने की बधाई देता है।प्रार्थना भी अपने मिल्टन वाले टिफिन से "गाजर का हलवा " पार्थ को थमाती है।"तुझे पता है,ये सिर्फ मैंने बनाया है। दादी से पूछ पूछ कर",प्रार्थना कहती है। आज गाजर के हलवे में कम शक्कर,प्रार्थना के प्रेम की मिठास के आगे फीकी थी। पार्थ और प्रार्थना दोनों एकटक एक दूसरे को देख रहे थे।कुछ रिश्तों में रिश्ते का होना जरूरी नहीं होता। इस चीज का एहसास हमें तब होता है। जब कोई पराया हमारी अपनो से भी ज्यादा मदद करता है। "चलिए पार्थ भैया,प्रधानाध्यापक साहब बुला रहे हैं,"स्कूल के लिए चपरासी और बच्चों के मनु भैया ने पार्थ से आकर बोला। "चलों मनु भैया,आज तो मामा ठाकुर ने हवेली पर बुलाया है,"पार्थ ने कहा।प्रधानाध्यापक के उपनाम को सुन प्रार्थना , मनु भैया और पार्थ जोरों से हंसने लगे।
चौधरी साहब जो एक कड़क प्रधानाध्यापक थे आज बिलकुल नरम मिजाज के लग रहे थे।प्रार्थना के सिर पर हाथ रखते हुए बोले,"बेटी आज तुमने स्कूल में अव्वल आकर मेरे स्वर्गीय पत्नी की इच्छा पूर्ण कर दी।हमने जब ये स्कूल साथ खोला था तो वो मुझसे हमेशा कहती थी।देखना चौधरी साहब एक दिन कोई लड़की हमारे इस स्कूल का नाम रोशन करेगी"। आज मामा ठाकुर के अंदर,ये परिवर्तन देख पार्थ,मनु भैया और प्रार्थना की आंखें नम हो गईं थीं।दोनो लोगों को चौधरी साहब ने पुरुस्कार और भविष्य की शुभकामनाएं देकर स्कूल से विदा किया।रास्ते में चलते हुए।पार्थ प्रार्थना से बोला,"सच में यार अगर प्रेम पानी की तरह पवित्र और निरंतर किया जाए तो पत्थर भी अपना आकार बदल लेता है"।
क्लीनिक प्लस वाली" पार्ट-15
जून का महीना था। गर्मी अपने चरम पर थी।पार्थ और प्रार्थना को मिले एक महीना हो चुका था।पार्थ,प्रयागराज में भारतीय सेना की "टेक्निकल एंट्री स्कीम (TES)" का साक्षात्कार देने गया था।इधर आज प्रार्थना का भी नीट का रिजल्ट आने वाला था।आज पार्थ और प्रार्थना दोनो के लिए महत्वपूर्ण दिन था।लेकिन दोनो एक दूसरे से मीलों दूर थे।प्रयागराज जंक्शन से आर्मी की बस ने सभी आगुंतको को छावनी तक पहुंचाया।सभी कैडेट को सुबह का नाश्ता मिला।आज से इंटरव्यू शुरू हो रहे थे।सभी कैडेटों को "पिक्चर परसेप्शन डिस्क्रप्शन राउंड " के लिए बुलाया गया।सभी कैडेट एक एक करके अंदर जा रहे थे। पार्थ का नंबर आ चुका था।पार्थ ने रूम के दरवाजे को खोलते हुए अंदर आने की परमिशन मांगते हुए बोला,"May I Come in Sir" ।अंदर बैठे इंटरव्यू पैनल के सदस्य ने पार्थ कोबैठने का इशारा कर, तस्वीर दिखाते हुए पूछा,"पार्थ,तुम्हारे इस तस्वीर को लेकर क्या विचार हैं"।रानी लक्ष्मीबाई की अपने घोड़े के साथ खाई से कूदते वक्त की तस्वीर को देख पार्थ बोलता है," सर जीवन में व्यक्ति मौत और शहादत दोनो में से एक ही को पा पाता है। चूंकि वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई मौत से ज्यादा शहादत को पसंद करती थीं इस लिए उन्होंने ये राह चुनी।दूसरा तथ्य है कि रानी जी की इस छलांग में जीवन की एक नई उम्मीद भी छिपी हुई थी अर्थात दुश्मन के हाथों से मौत पाने से बेहतर है। अंत समय में अपनी आखिरी कोशिश करते हुए भी दुश्मन को अचंभित कर देना।वो आखिरी कोशिश या जीवन लाएगी या शहादत"। पैनल में बैठे कर्नल यादव जी ने पार्थ से कहा,"तुम कहानियां अच्छी बनाते हो लेकिन अफसोस हमें कहानीकार नहीं एक फौजी की जरूरत है। जो कहानी नहीं इतिहास रचे"।कर्नल यादव की बात पार्थ को चुभ गई थी।पार्थ पहले ही राउंड में असफल हो गया था।छावनी से प्रयागराज कैंट तक सेना के वाहन से रास्ता एक दम असली फौजी वाली जिंदगी का अहसास करा रहा था।तभी सड़क पर से पार्थ को फौजी समझ एक बच्चे से सैल्यूट किया।पार्थ ने नम आंखों के साथ उस बच्चे को सैल्यूट किया।आज पूरी तरह टूट चुके पार्थ के जीवन में उस बच्चे के सैल्यूट ने एक उत्प्रेरक का काम किया था। सच में डूबते को तिनके का सहारा ही बचा लेेता है।
पार्थ ,प्रयागराज से अपने कस्बे वापस आ चुका। उस बच्चे की सलामी ने उसकी ख्वाहिश को नीलाम होने से बचा लिया था।तभी पार्थ का फोन बजा।पार्थ ने फोन को कान से लगाते हुए बोला,"बोल प्रार्थना क्या हाल हैं"। "यार मेरा नीट में हो गया,मेरी ऑल इंडिया रैंक 30 आई है,"प्रार्थना ने बोला। "Congrats यार", पार्थ ने उत्तर दिया।प्रार्थना ने पार्थ की उदासी से भरी आवाज को भांपते हुए पूछा,"क्या बात है पार्थ, तू उदास क्यों है"।पार्थ ने शाम को मंदिर पर मिलने को कहा।शाम के लगभग 7 बज चुके थे।मंदिर की आरती होने के बाद पार्थ और प्रार्थना दोनो वहीं पास वाले बरगद के पेड़ के किनारे मिले।सिर्फ एक महीने की दूरी उन्हें वर्षों सी प्रतीत हो रही थी। प्रार्थना ने पार्थ के हाथ को थामते हुए पूछा ," क्या हुआ पार्थ,उदास क्यों है"। पार्थ ने उसे इंटरव्यू में हुई सारी घटना बता दी।प्रार्थना ने पार्थ से कहा ,"क्या हुआ इतना परेशान क्यों है।अभी तो तू ग्रेजुएशन के बाद CDS भी दे सकता है और अभी बहुत मौके हैं"।पार्थ ने थोड़ा मुस्कराते हुए प्रार्थना से पूछा ,"अच्छा बताओ फिर तुम्हारी काउंसिलिंग कब है"।
"बस 2 दिन में है,उम्मीद है दिल्ली एम्स मिल जायेगा",प्रार्थना ने कहा।
पार्थ ने अपने हाथ में प्रार्थना की हथेलियाँ लेते हुए पूछा, "डॉक्टर साहिबा, तुम मुझे भूलोगी तो नहीं"।
"वैसे तो नहीं भूलूंगी। लेकिन हां अगर कोई सरकारी नौकरी वाला मिल गया तो सोचना पड़ेगा"प्रार्थना ने हंसते हुए कहा।पार्थ ने प्रार्थना से नाराज होते हुए बोला,"चल हट पगली। सच में प्रार्थना ,सरकारी नौकरी का अपने समाज में बहुत महत्व है।बेरोजगारी के वक्त जिस लड़के का नाम परिवार के किसी शादी के कार्ड पर दर्शनाभिलाषी वालों में लिखा रहता है।वही लड़के का नाम सरकारी नौकरी के बाद स्वागतकर्ताओं में उसके पद के साथ शामिल हो जाता है"।
पार्थ की बातों की गहराइयों को समझ प्रार्थना सोच रही थी।सच में पार्थ बदल गया है।वो कुछ महीनों पहले ऐसे पार्थ से मिली थी जो अपनी ही धुन में मस्त और मग्न रहता था। प्रेम और जिम्मेदारियां दोनो एक दूसरे के पूरक है।जब भी हमें इनका एहसास होता है हम खुद ब खुद जिम्मेदार हो जाते हैं।जैसे पार्थ ठाकुर हो रहा था।
मन्दिर से दोनो लोग अपने अपने घर की ओर चलने लगे।शाम के अंधेरे में भी इतना उजाला होता है कि हम साथ चल रहे लोगों को जी भर कर देख सकें। इसी उजाले में पार्थ देख रहा था प्रार्थना को।तभी पार्थ का फोन बजा,मेहता जी का फोन था।"पार्थ घर आ जाओ, ठाकुर साहब की तबियत ज्यादा खराब है",मेहता जी ने फोन पर बोला।पार्थ ने प्रार्थना से कहा ,"यार बाबा की तबियत खराब है। मैं घर जा रहा हूं।फिर मिलते हैं।पार्थ दौड़ते हुए अपने घर पहुंचा।दादा जी को लेकर मेहता जी,अर्थव भैया और पार्थ शहर के हॉस्पिटल पहुंचे।डॉक्टर साहब ने पार्थ के दादा की जांच करने के बाद बताया,"इनको कैंसर है और इनका बचना नामुमकिन है"।
डॉक्टर की बात सुनकर पार्थ रोने लगा।मेहता अंकल में पार्थ को समझाया और दादा को घर ले आएं।शाम का खाना मेहता जी ने पार्थ के घर भिजवा दिया।छोटे कस्बों में आज भी बड़े दिल वाले पड़ोसी रहते हैं।रात गर्मी से पसीने छोड़ रही थी। मच्छर रातों का खून चूस कर उन्हें सुबह करने की तैयारी में थे।आज पार्थ जल्दी उठ गया था।उसने बाबा के लिए चाय बनाई और उन्हें देने गया।"बाबा लेओ चाय पीलो",पार्थ ने कहा। बाबा ने चाय को हाथ में ले कर पार्थ से ब्रेड मांगा।पार्थ ब्रेड लेने अपनी रसोई में चला गया। तभी अचानक गिलास के गिरने की आवाज आई।पार्थ गिलास की आवाज के पीछे दौड़ा। सामने पार्थ के बाबा चारपाई पर लेटे थे और गिलास जमीन पर डला हुआ था।पार्थ ने गिलास को उठाते हुए बाबा से कहा," क्या हुआ शक्कर कम हो गई क्या"। बाबा ने कोई जवाब नही दिया।बाबा पार्थ को एक टक देख रहे थे।बाबा की आंखों के किनारे से आंसू की दो बूंद थी।पार्थ ने बाबा को पकड़ कर पूछा बाबा ,"आप क्यों रो रहे हो"।बाबा फिर से खामोश थे।इस खामोशी का मतलब पार्थ समझ गया था।आज पार्थ दूसरी बार अनाथ हुआ था।बचपन में मां बाप के गुजर जाने का पार्थ को कभी दुख ना था।क्योंकि तब वो अबोध था।लेकिन आज बाबा के जाने से वो बिल्कुल टूट गया था।पार्थ ने रोते हुए मेहता अंकल जी को बुलाया।पार्थ के चाचा को भी बुलाया गया।शाम तक ठाकुर साहब को श्मशान में दाग देकर ।पार्थ को उसके चाचा अपने साथ लेकर देहरादून चले गए।देहरादून भारत की राजधानी दिल्ली से उत्तर की ओर बसा एक सुकून भरा शहर है।पार्थ के चाचा 12 वीं के बाद आगे ना पढ़ने की वजह से यहां अपने फूफा के साथ भाग आए थे। फूफा जी के ही सहारे पार्थ के चाचा ने देहरादून के पलटन बाजार में साड़ियों की एक दुकान की थी।तब से पार्थ के चाचा देहरादून के ही हो गए।अब पार्थ को अपने चाचा के साथ दुकान पर बैठना पड़ता।एक दिन एक हट्टा खट्टा लड़का,पार्थ की दुकान पर आया।"भाई कोई साड़ी दिखाओ।अच्छी होनी चाहिए।मेरी इकलौती बहन की शादी है",वो लड़का बोला।लड़के ने 5000 कीमत की साड़ी पसंद की।उसने जब अपना पर्स निकाल कर रुपए दिए तो पार्थ ने देखा उसके पहिचांन पत्र को देखा।
"IMA - Dehradun
Name- Kramveer Saxena
Rank- Cadet
पार्थ के मन में फिर से फौजी बनने के उसके सपनो के लिए लड़ने की चाह उठी। सिप्टेंबर का महीना बीत चुका था।रेगुलर कॉलेज में प्रवेश होना बंद हो चुके थे।पार्थ उदास हो गया।क्योंकि CDS के पेपर के लिए स्नातक का होना आवश्यक है।
अब तो वो ना ही प्रार्थना से कोई सलाह ले सकता था।ना ही उस से फोन कर सकता था।क्योंकि प्रार्थना की दादी ने घर किराए पर दे दिया था।और वो प्रार्थना के साथ देहली रहने लगी थीं।पार्थ ने उदास चेहरे के साथ चाचा की दुकान को बढ़ाया(बंद किया)।शाम का खाना खाकर पार्थ अपने कमरे में सोने चला गया।मोबाइल चलाते हुए पार्थ ,प्रार्थना को फेसबुक पर खोजने की कोशिश कर रहा था।लेकिन असफलता मिलती।तभी उसके मोबाइल पर मैसेज आया"India's Largest Open University IGNOU exteded their UG and PG addmission last date till 5 October"
पार्थ के लिए ये नोटिफिकेशन एक वरदान सा था।पार्थ ने तुरंत वेबसाइट से लॉगिन कर "BA in Defence" में एडमिशन ले लिया।आज रात पार्थ सुकून से सो पाया था।
पार्थ ने अपने सपने की ओर एक कदम बढ़ा लिया था।
पार्ट -19
पार्थ हर रोज फेसबुक पर प्रार्थना को खोजता।लेकिन असफल होता।धीरे धीरे साल बीतने लगे।पार्थ ने प्रार्थना को फिर से पाने की उम्मीद छोड़ ही दी थी।पार्थ का पूरा ध्यान अब अपने स्नातक के तृतीय वर्ष के पेपरों पर था।अप्रैल के महीने में पेपर पूरे होने के बाद पार्थ ने CDS की परीक्षा के लिए आवेदन किया।देहरादून के पलटन बाजार में पार्थ को सब लोग जानने लगे थे।वहीं पार्थ के चाचा के सामने वाली दुकान अब्दुल मिर्जा जी की थी।पार्थ और पूरा पलटन बाजार उन्हें अब्दुल चाचा बुलाता था।अब्दुल चाचा की उम्र ज्यादा होने के कारण उनकी बेटी अर्शी मिर्जा अक्सर उनकी दुकान की देख भाल करती थी।तीन साल पहले जब पार्थ देहरादून आया था तब अर्शी ही थी जिसने उसे पूरा देहरादून घुमाया था।अर्शी,पार्थ को पसंद करती थी।लेकिन शुरुआत में पार्थ सिर्फ प्रार्थना के विषय में सोचता था।लेकिन धीरे धीरे अर्शी के लाए गाजर के हलवे में पार्थ को प्रार्थना के लाए गाजर के हलवे सा प्रेम पाता।पार्थ भी अर्शी को पसंद करने लगा था।लेकिन पसंद करना जितना आसान होता है।उतना ही कठिन होता है उस पसंदीदा शख्स को पाना।पार्थ और अर्शी हर रोज आमने सामने होकर भी बहुत दूर थे एक दूसरे से। उनकी दुकानों के बीच की जो सड़क थी।वो सड़क ,सड़क शायद पलटन बाजार से गुजरने वाले राहगीरों के लिए होगी।लेकिन पार्थ और अर्शी के लिए तो दीवार थी।जो समाज के लोगों ने बनाई थी।जिसे लव जिहाद और घर वापसी जैसे इजाद किए हुए शब्दों की ईटो से बनाया गया था।
पार्ट-20
उम्र के साथ बीमारियों की गिरफ्त में आते अब्दुल चाचा अपनी एकलौती अर्शी के लिए परेशान रहते।एक दिन अब्दुल चाचा ने पार्थ के चाचा को पास बैठाते हुए बोला,"ठाकुर साहब,पार्थ की उम्र हो रही है शादी की।कब तक यूं ही ठाकुराइन जी पूरे घर का भार संभालती रहेंगी।उसका भी निकाह वगैरा करवा दीजिए।आपको भी आराम हो जाएगा"।
"मिर्जा साहब सोच तो मैं भी यही रहा था।लेकिन क्या करे इस परदेश जैसे शहर ने मुझे कभी अपनाया ही कहां।यहां अपनी कोई रिश्तेदारी भी तो नहीं है और आप तो जानते है हमारे गांव के लोग बिटिया को ज्यादा दूर भी नहीं ब्याहते हैं।",पार्थ के चाचा ने कहा।
"हमारा यहां कोई नातेदार नहीं बोलकर ,आपने हमे भी इस परदेशी शहर में पराया कर दिया ठाकुर जी",अब्दुल चाचा ने कहा।
छोटे कस्बों से बड़े शहर आए लोग अपना जीवन इस शहर की चकाचौंध में खपा देते हैं।लेकिन भी भी वो शहर उन्हें कभी उतना अपना नहीं लगता।जितना कि उन्हें वो कस्बा या शहर लगता है जहां की गलियों में वो बेफिक्र होकर दौड़े थे।ये दर्द आज पार्थ के चाचा और अर्शी के अब्बू के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।
तभी अब्दुल चाचा ,पार्थ के चाचा के करीब आते हुए बोले,"ठाकुर साहब अगर बुरा न माने तो एक दरख्वास्त है आपसे"।
"इसमें संकोच कैसा मिर्जा साहब बोलिए "पार्थ के चाचा ने कहा।
"अर्शी और पार्थ एक दूसरे से प्रेम करते हैं।कल जब आपने मेरे लिए पार्थ से चने का साग भिजवाया था तब मैंने उन्हें बाते करते सुना। मैं मानता हूं कि मुझे उन्हें समझाना चाहिए था लेकिन ठाकुर साहब डर लगता है आज कल के बच्चों से।पता नहीं किस बात को दिल पर ले लें।इस लिए सोचा आपसे बात करूं। मैं भी अब शायद कुछ दिनो का मेहमान हूं।उसके बाद मालूम नहीं मेरी अर्शी का ख्याल कौन रखेगा।हमारी बेगम के गुजरने के बाद ठाकुराइन ने अर्शी को जो प्रेम दिया वैसा शायद ही उसकी अम्मी के सिवा कोई और उसे दे पाता,"मिर्जा साहब ये बोलते हुए उदास हो गए थे।
मिर्जा साहब की बातों को सुनकर उन्हें ढांढस बंधाते हुए पार्थ के चाचा ने कहा,"मिर्जा साहब ,अर्शी आज भी हमें हमारे घर का हिस्सा लगती है।आपने जो प्रस्ताव दिया वो तो ठाकुराइन हमें रोज कहती हैं।लेकिन मुझे इसी बात का संकोच था की ये धर्म के ठेकेदार कहीं हमारा जीना हराम ना कर दें।लेकिन अगर आपकी हां है तो हमारी भी हां है।अर्शी को अपनी बेटी की रूप में पाकर हम तो धन्य हो जायेंगे।अब्दुल मिर्जा साहब आज अर्शी के लिए बेफिक्र हो गए थे।पार्थ जैसा नेकदिल,ईमान वाले लड़के को अर्शी मिर्जा के जीवन साथी के रूप में देख अब्दुल साहब प्रसन्न थे।जैसे अल्लाह ने आज उनके बेटे ना होने की कमी को पूरा कर दिया था।
...#जलज कुमार
... To be continue
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