Tuesday, 8 December 2020

प्लेसमेंट........एक सफल असफलता

                                                                            पार्ट-1

3 rd  ईयर में आते आते हमें ये तो पता चल गया था। हम हर क्षेत्र मे  अपना सर्वोत्तम दे सकते है परंतु इस अभियांत्रिकी(Engineering) में शायद कभी नही पर फिर भी हॉस्टल का हर लेखक, शायर ,गायक, क्रिकेटर, फुटबालर, कॉमेडियन, ना जाने क्यों पकड़ लेता था इंजीनियरिंग की उन किताबो को बस इतना कहकर की "यार शायद ये किताबो का बोझ ही कम कर सकेगा हमारी जिम्मेदारियों के बोझ को" और फिर सब की आँखे नंम हो जाती और हम फिर से खुद को समझाते,तभी "ले ना यार " कि एक आवाज के कुछ समय बाद हम उड़ा देते थे सभी परेशानियो को धुए में, पर एक खौफ रहता था अगर प्लेसमेंट ना हुआ तो, इस खौफ मे ना जाने कितनी रातों को जगाया था हमारे साथ, हॉस्टल की छत हमारे लिए माँ की गोद सी थी। जहाँ लेट कर हम खोल देते थे बेफ़िक् होकर अपने सारे राज,जिंदगी ने अपनी जद्दोहद को चालू रखा और हमने कभी उनको किताबो का नशा करके उड़ाया कभी धुए में, पर कोई  और था जिसे करीब  छत सा सुकूँ महसूस होता था जो मुझे अपने सपने बताती थी हम दोनो को पता था की हम शायद ही कभी मिल पाएंगे कॉलेज के बाद पर वो एक बात कहती थी "यार हम अभी अपने माँ पापा के सपने है और हमें उनके सपनो को सफल करना होगा " 

उसकी हंसी कुछ ऐसी ही थी कि  अपने गम को भूलना शायद कोई बडी बात नही तो हैं दोस्तों मैं स्वप्निल आपको बता रहा हूँ कहानी अपनी सफल हुई असफलता की , किताबो से ज्यादा वक्त मैं अब उसको देने लगा था,पर जब भी प्लेसमेंट का ख्याल आता तो हाथो में मैंकेनिकल ओब्जेक्टिव और R S अग्रवाल की किताब लिए बैठ जाता था । कुछ घंटो तक तो जोश रहा पर फिर मन नही लगता था अक्सर. ऐसा ही होता वक्त के साथ अगर ख्वाहिशे मुकम्मल ना हो तो हम  अफसोस और शोक दोनो ही जताना छोड़ देते है। कुछ ऐसा ही होता था मेरे साथ उन दिनों, जनवरी की कडकड़ाती सर्दी में हम छतो पर घूमते थे बाते बताते थे दोस्तो को अपने दिन के बारे में आज हमारा दोस्त अर्नब हल्का उदास था हम लोग उसके मजे ले रहे थे तभी उसकी आँख से आसुं निकल आये आज पहली बार हुआ था जब अर्नब को हमने रोता हुआ देखा था क्युकी ये वही अर्नब था जो सबको हँसाता था पूछने पर पता चला कि आज उसका ब्रेकअप हुआ है ब्रेकअप शब्द में ही कुछ टूटने का एहसास होता है पर ब्रेकअप में दिल नही टूटता, टूटता है विश्वास और वादे जो हम एक अंजान शक्स पर कर लेते है और अर्नब तो पागल था अर्नब ही क्यों अंतिमा भी तो उसका कितना ख्याल रखती थी एक बार तो अर्नब ने जब अंतिमा बीमार थी अपना पेपर भी छोड़ दिया था। और उसके बदले अंतिमा ने क्या दिया उसे आँसू, पर अंतिमा की भी तो कुछ भावनाए रही होंगी अर्नब को लेकर वो गलत है ये कहना शायद किसी के मौलिक अधिकारों का हनन है अक्सर ऐसा  ही होता है लड़कियां पहले किसी पर पूरा हक जताती

फिर तुम किस बात का हक जता रहे हो कहकर सब भुला देती है क्या इतना आसान होता है भूलना या भुलाना। हमने  अर्नब को सम्भाल लिया था। उसके दर्द को उस वक्त हमने नही संभाला था। पर आज जब रजाई मे  सोते वक्त जब मेरे मोबाइल पर मेसेज आया तो मेरे चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गयी थी क्युकी अवनि ने आज मुझे पहली बार  ❤ वाली  इमोजी भेजी थी। अचानक मै  उदास हो गया क्युकी मेरे सामने अर्नब के आँसू वाली तस्वीर और उसकी बात "क्यों लडकियां व्यापार और प्यार में अंतर नहीं कर पाती ?"

   "सुबह 6: 30 बजे मेरा MD का लेक्चर था और अवनी की भी पावर इलेक्ट्रॉनिक्स की क्लास थी। इसी लिए मैं आज सुबह 6 :00 बजे ही रूम से निकल गया था। क्युकी उससे मिलना था। मै जब कॉलेज गेट पर पहुंचा तो वो दिख गयी । मैंने उससे गुड मॉर्निंग बोला तो उसने थोड़ा नाराज होकर बोला " गुड मॉर्निंग मिस्टर इग्नोरर। मुझे समझ नही आई उसकी इस बेरुखी की वजह,मैंने पूछा क्या बात है तो बोली रात मे मेसेज सींन कर  जबाब क्यों नही दिया। मै चुप हो गया, वो बोली "बताओ बताओ" । "हर सवाल का जबाब नही होता अवनि कुछ समझने पडते हैं " और इतना कहकर में क्लास लेने चला आया पूरी क्लास में शर्मा सर कुछ पढाते रहे पर मेरे मन में जब भी अवनि के उस मेसेज की तस्वीर और अर्नब की वो बात दोनो एक आंतरिक युद्ध कर रहे थे। सच मे  युद्ध मे किसी की जीत नही होती क्युकी दोनो पक्षों ने कुछ ना कुछ तो खोया होता है और मैं नही चाहता था कि मै उसको पाकर खोऊ, आखिर क्यों इतना जुड़ाव हो गया था।मुझे अवनि से 1 साल पहले ही तो वो मिली थी। पता कैसे वो मेरी जिंदगी के अहम शख्सो में शामिल हो गयी, यही तो उसकी खूबियत थी। जिसके भी करीब जाती थी उसको अपना बना लेती थी। कोई छोड़ना ही नही चाहता था उसका साथ, उसकी क्लास का टॉपर अंकित तो उसको नोट्स मे लवलेटर लिख कर भेजता था। एक बार पकड लिया मैंने उसको, वो तो डर ही गया था। तब से आज तक अवनि और मैं साथ में नोटस बनाते है । उसके नोट्स के चक्कर में मुझे पता चला की TV और Antina भी सब्जेक्ट होते हैं और वो मुझसे पूछती थी स्वप्निल "ये  TOM कौन सा सब्जेक्ट है यार "  और खिलखिलाकर हंसती थी। और मैं बस उसे एक टक देखता ही रहता, 

सच में उसके साथ पता ही नही चलता था दिन का, 

सारी थकान गायब सी हो जाती थी "जब उसको होस्टल छोड़ते वक्त उसकी "बाय स्वप्निल " को सुनता था।" वक्त तेजी से बीत रहा था फरवरी आ चुकी थी। 

मैं अपने करीयर के बारे मे ज्यादा सोचने लगा था। और थोडी टेंशन भी रहती थी। इस लिए अब अवनि के मेसेज के  रिप्लाई भी कम देता था। मैं चाहता था की वो मुझसे कम बात करे क्युकी मुझे पता था कि कॉलेज के बाद उसको भूलना मेरे लिए सिर्फ शब्द रहे जायेंगे। यही तो हमे सिखाती है इंजीनियरिंग , कम खर्च में बेहतरीन, यही चाहता था मैं कि हम अलग होने पर भी बेहतरीन रहे पर एक दोस्त के रूप में, आँसू और अपने सपनो को इन पर खर्च ना करे। मैं होस्टल पहुँच चुका था। सच में जिम्मेदारियां और सोच कदमो की रफ़्तारो को थाम देती है ।यही कारण था कि मैंने 10मिनट की दूरी आधे घंटे मैं तय की थी उस दिन ..... 

 होस्टल पहुंचना हमारे लिए खुशी की बात होती थी। क्युकी हमारा घर इसके कमरे, गालियाँ इसकी गैलरियाँ होती थी।तो इन गलियों में ,अरे भाई गैलरियोँ में हल्ला होना आम बात थी। यहाँ के हमारे पडोसी बड़े तो हो गए थे पर  उनका बचपना नही गया था। तभी तो कभी पानी डाल जाना, कभी गेट को पैर मारकर खोल देना ,जैसी इनकी हरकते आज भी जिंदा थी लेकिन एक बात जरूर सीखने को मिलती है होस्टल से कि  अगर आप में बचपना है तो आप हर मुसीबत को आराम से पार कर लोगे क्युकी बचपन चिंताओ मुक्त होता है। और चिंताएं ही हमारी प्रत्येक मुसीबत की पहली वजह होती है। शाम के आठ बज चुके थे खाना खाने के लिए इसी समय घंटी बजती थी। पर हम हॉस्टलर पहले से ही थाली बजा देते  थे। इस कारण उस घंटी का बजना जैसे आज के समय में "लिव-इन-रिलेशनशिप "को शादी नाम का एक डॉक्यूमेंट देने जैसा होता था। वरना जान तो हर कोई जाता था कि खाना मिल रहा है। वैसे ये तो सदा सत्य बात है कि बिना एक पंजाबी और बिहारी लड़के के  कोई  होस्टल होस्टल नही होता ,लेकिन हमारे होस्टल मे  तो बिहार के लडके बहुत थे। मेरी ब्रांच मैकेनिकल में  लव झा और संजू यादव थे पर  पंजाब वाला लड़का ऑटोमोबिल से था। उसका नाम सूरज सिंह था। खाना खाते हुए इनकी बातों की आवाजो से शमां बंधा रहता था और इनके जाने की बाद सब खामोश, खाना खाकर मे  अपने रूम मे आ चुका था तभी मेरे रूममेट भानू ने बोला "भाई तेरा फोन बज रहा है बहुत देर से ",मैंने फोन उठाया तो अवनि की चार मिसकाल थी। मैंने दोबारा उसको कॉल लगाया तो उधर से आवाज आयी। 

" जी फुर्सत मिल गयी जनाब को " , मैं समझ गया था कि अब अवनि फिर नाराज हो गयी है। मैंने बोला "जी क्या करे जनाब को भूख भी लगती है तो बस  उसी का बंदोबस्त कर रहे थे अगर हमारी वजह से मोहतरमा को कोई तकुल्लुफ हुआ हो तो माफ करे"

, "हा हा बस बस माफ करो जो आपके सामने हिंदी और उर्दू का प्रयोग किया " अवनी ने कहा। फिर वो बोली " यार हमारे कैंपस के लिए कम्पनी आ रही है", 

मैंने बोला "तो इसमे उदास  होने की क्या बात है ये तो अच्छी बात  हैं  ", " तुम्हे याद है जब हम इंटर्नशिप पर थे तो हमने क्या प्लान किया था कि हमारी ब्रांच अलग है पर हम जॉब साथ में करेंगे याद है " अवनी ने कहा, मुझे याद आ गया वो दिन जब हम इंटर्नशिप के लिए भेल हरिद्वार में गए tथे,उस दिन हरिद्वार घाट पर मैं उसके करीब बैठा था आसमां में चाँद चांदनी के साथ अठखेलिया खेल रहा था, सितारे थे जो छिपछिप कर देख रहे थे चाँद को,इसी का प्रतिबिंब घाट के किनारे पर बहती माँ गंगा पर पड रहा था । जल की पवित्रता को शायद अवनी ने पढ कर मेरा हाथ थाम लिया था और वो बोल रही थी "स्वप्निल एक वादा करो मुझसे क्या तुम मेरे दोस्त की तरह यूँ ही मेरे हर सुख दुख मे मेरा साथ दोगे", उसकी आँखों मे हल्के आँसू आ गए थे, मैने उसको उस वक्त हँसाने के लिए कह दिया था। कि " यार टेंशन ना ले हम एक ही कम्पनी मे  जॉब करेंगे " और उसके आँसू अपने हाथो से पोछकर उसको अपनी ह्रदयगति का आभास कराने लगा था। 

" अरे कहाँ खो गए जनाब स्वप्निल" अवनी ने फोन पर जोर से कहा , मैंने उससे बोला "कहीं नही , यार अवनी जिंदगी हमारे नही उपर वाले के प्लान के हिसाब से चलती है , और हाँ तुम कल प्लेसमेंट के लिए जाओगी जरूर "

अवनी बोली "तुम साथ चलोगे एक्जाम हॉल तक "

मैंने कहा "हाँ, ओके बाय  गुड नाईट"

"ओके गुड नाईट & हॉरर ड्रीम , हा हा, " अवनी ने कहा, 

इन बातों में जो प्यार था हम दोनों के बीच वो कौन सा प्यार है ? इसकी तलाश मुझे हर वक्त रहती थी। 

पर ना जाने क्यों कुछ लोग हमारी जिंदगी में ऐसे आ जाते हैं जिनके प्रति हमारा व्यवहार वृक्ष और नदी के समान हो जाता है। जिन्हे सिर्फ उनसे लाभांवित होने वाले व्यक्ति की मुस्कराहट में ही सुकूँ मिल जाता है ।

.आज मैं सुबह जल्दी उठ गया था। मैंने स्नान कर प्रभु के समक्ष अवनी के लिए प्रार्थना की थी। हमारी आदतों मे  होता है। हम माँ-बाप और ईश्वर को  सदैव अपने कठिन समय में याद करते है। कॉलेज जाते टाइम मैंने उसके लिए डेयरी मिल्क की चॉकलेट ले ली थी। अवनी  कॉलेज गेट पर खडी थी मुझे देखते ही बोली "कभी तो टाईम पर आया कर यार  स्वप्निल " , मैंने उसको डेयरी मिल्क की चॉकलेट देकर बेस्ट ऑफ लक बोला , वो मुस्करा कर बोली "तेरे इस बेस्ट ऑफ लक की तो बहुत जरूरत है ,ओके मिलती हूँ एक्जाम के बाद ", मैंने पूछा कंपनी  कौन सी है और उंगलियो से पैकेज  की ओर इशारा  किया " , वो रुकी और बोली TCS  और  ये 7.6 लाख ,उंगलियों से इशारा करते हुए और फिर बाय बोल कर एक्जाम  हॉल की और चली गयी।

 उसके जाने के बाद मैं अपनी SOM(Strength of material)की क्लास लेने चला गया पर क्लास के बाहर  पार्क में प्यार और इंजीनियरिंग के अंतिम चरण पर पहुँच चुके कुछ नवयुवक और नवयुवती एक दुसरे से आलिंगन हो कर बैठे थे और एक तरफ खुद को और किस्मत को कोसने वाले और एक तरफा प्यार के वाहक  कुछ युवक काक चेष्ठा  और वको ध्यानम लिए  खड़े थे। पता चला मिश्रा सर आये नही थे। कॉलेज के अंतिम दिन होते ही ऐसे है। इन दिनों में टीचर लड़को से पिछले सालों के सारे बंक क्लासेस का बदला खुद क्लास बंक करके ले लेते है । आगे भी दो क्लास खाली थी तो में कैंटीन में चाय पीने चला गया तभी भानु पास आकर बैठे गया। मैंने कैंटीन वाले भैया से बोला " भैया दो कटिंग चाय", भानु बोला भाई क्या है यार हमारे लिए कोई कंपनी नही आयेगी क्या? " "देखते है भाई " मैंने कहा, तभी  चाय आ गई।

चाय पीकर मैं बाहर निकला तो अवनी अपनी सहेलियो के साथ आ रही थी। मुझे देख हल्का मुस्करायी, मैंने आँखों के इशारों से प्रश्नवाचक भरे लहजे में पूछा "पेपर कैसा हुआ"। उसने पलकों को झपकाते हुए सिर को उपर नीचे कर के अच्छा हुआ के संकेत दिया। अवनी और मैंने पहले ही एक वादा किया था कि हम कभी भी एक दूसरे के दोस्तो के बीच बात नही करेंगे। 3:45 की  RAC की क्लास लेने के बाद हम लोग हॉस्टल चले आये थे। 

रात को खाना खाने के बाद मैंने अपना मोबाइल देखा तो अवनी की 4 मिस्डकाल और एक मेसेज " कॉल मी अर्जेंटली" लिखा हुआ आया था। मैंने ज्यों ही उसे कॉल करना चाहा तो उसकी वीडियो कॉल आ गयी मैंने तुरंत काट दी फिर अच्छे से टेबल लैंप जला कर और थोड़े बाल संभाल कर उसे दोबारा कॉल किया तो अवनी की आँखों से आँसू निकल रहे थे। मैंने बोला" इसमे रोना क्या कोई नही किसी और कंपनी में हो जायेगा" तभी उसकी सहेली राशि ने बोला यार ये पागल है। इसका हो गया । ये रो इस लिए रही है क्युकी अब तुम्हारे साथ जॉब नही कर पायेगी।वो पल मेरी जिंदगी का सबसे अजीब पल था क्युकी उस दिन मुस्कराहट मेरे लवो पर थे पर एक अजब सी वेदना ने मेरे ह्रदय भावो पर आघात किया था तभी राशि बोली संमझाओ इसे स्वप्निल,। क्या समझाता मैं उसको की तुम्हारे एक वचन की वजह से मैं बंधा हुआ हूँ या ये की तुमसे ज्यादा आँसू मेरी इन आँखों में  हैं जो रो भी नही सकती। तभी मैंने खुद को सम्भालते हुए बोला "बधाई हो TCS  की नई एम्प्लॉयी मिस अवनी जी को "। उसने अपनी हथेलियों से आँसुओं को पोछकर बोला "थैंक्यू स्वप्निल तेरे बेस्ट ऑफ लक का ",। मैंने बोला "थैंक्यू से काम नही चलेगा पार्टी कब मिलेगी " ' उसने मुस्कराकर कहा जब तुम चाहो।

मैंने कहा" हाँ वो तो हमारा हक है  और 😂 वाली इमोजी भेजी,। अवनी बताने लगी कि उससे इंटरव्यू में क्या पूछ गया।उसने कंपनी को बताया की उसको आगे पढना है। ना जाने क्या था उसकी बातों में क्युकी मैं कभी थकता नही था उससे बात करने को। कई बहाने मै ढुंढ लेता था।तभी अवनी बोली, "चल बाय  &गुड नाईट  स्वप्निल मिलते हैं कल।

. उस रात लगभग दस बज चुके थे।तभी मेरा रूममेट भानू आया और बोला यार स्वप्निल चल बे छत पर चल। जनवरी की कड़कडाती सर्दी में छत पर जाना जिंदगी को जोखिम मे डालना पर कंमबख्त ये दोस्त तुम्हे कहीं पर भी ले जाते है, उपर से रूममेट, थोडी देर में, मैं छत पर था और हमारे आसपास बैठे थे हॉस्टल के वो लड़के जो सिर्फ एक ही ज्ञान देते थे "भाई नौकरी तेरी भी लगेगी नौकरी मेरी भी लगेगी,हाँ थोड़ा बहुत अंतर होगा रुपयो का ।"

 तभी उनमे से एक महानुभाव  बोला "अरे यार जिसकी ना लगे हम उसकी लगवा देंगे " कई लड़के जो युद्ध से पहले ही हथियार डाल चुके थे। उस मित्र के करीब हो गए और बोले " हाँ ये बात तो सही कर रहा है। इसके चाचा एक बडी कंपनी में अच्छे पद पर हैं"। बस फिर क्या था जनाब खुश, तभी उस महफ़िल के मुख्य कार्यकरता ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली,पीछे से आवाज आयी कौन से लाये ही बे,"रेड ब्लैक "मुख्य कार्यकरता ने पीछे से आयी इस प्रश्नवाचक ध्वनी का का उत्तर दिया। अगर हॉस्टल की  इस महफ़िल को बाबा साहब देख लेते तो वो जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए आरक्षण से पहले ऐसी संगोष्ठियां करवाते यहाँ सब समान होते थे और छुआछूत को तो ये लोग एक दूसरे के द्वारा उपयोग की गयी सिगरेट के सहारे कश भर कर उड़ा देते थे।गोलाई मे सजी इस महफ़िल का नियम था की पहली सिगरेट के बाद ही दुसरी सिगरेट को जलाया जाता था।

 पांच महानुभावों से चुंबन प्राप्त कर ये बेबस सिगरेट मेरे पास आयी थी। चाहती थी वो कि मैं उसको मोक्ष की प्राप्ति अपने होठो से कराऊँ पर  मैं अनुभवहीन प्राणी उस तड़पती आत्मा की संतुष्टि का कारण ना बन सका और भानु के द्वारा उस मोक्ष की प्राप्ति हुई।

 वैसे अगर  व्यक्ति और सिगरेट की तुलना की जाए तो ज्यादा अंतर कहाँ होता है। दोनो की जीवन यात्रा में दोनो को कई लोगो के हाथो से गुजरना पड़ता है। हर व्यक्ति अपनी सुविधा अनुसार उपयोग करता है जीवन भी सुलगता है ।आग रूपी परेशानियों से और अंत मे बचती है सिर्फ राख,अरे में भी आध्यात्मिक हो रहा हूँ। क्या करे इन महफ़िल में हर व्यक्ति ज्ञान बाँटता है।

 यही कारण है इंजिनीयरिंग के आखरी सेमेस्टर में लगभग 75 प्रतिशत बालको को बाबागीरी में उज्ज्वल भविष्य नजर आता है और हो भी क्यों ना अब तो बाबा स्टार्टअप भी कर रहे है। विश्वास नही तो  कपालभासी वाले बाबा को ही देख लो। इस महफ़िल में रेगुलर सदस्यता देने वाले सदस्यों का एक पैनल था। जो नये सदस्य को पहले बकरे की तरह खिलाता था और फिर काटता था पर यह काटना किसी बन्दी द्वारा काटे जाने वाले काटने से अच्छा था क्युकी यहाँ पर सबका कटता था समय और जेब । बहुत कोशिशो के बाद भी पैनल मुझे सदस्यता देने में असमर्थ था क्युकी मे  सिर्फ उनके चखने में व्यस्त था। हरी मटर और हल्दी राम की आलू की भूजिया को कौन मना कर सकता है क्युकी मैं घर से इनके लिए हर बार नमकींन लाता था जो इनकी आपात कालीन परिस्थिती में मदद करती थी। इस लिए मुझे इनमे से भी कोई मना नही कर सकता था।

" चलो भाई का वार्डेंन आयेगा सुबह जल्दी जगाने कल 26 जनवरी के लिए" मुख्य कार्यकर्ता ने कहा, भले ही 26 जनवरी को देश को गणतंत्र के सूत्र में बाँधा गया था पर ये दिन हम होस्टलर को सिर्फ अलग अलग करता था वो भी कॉलेज के मैदान की सफाई के लिए। अत: हम सभी बिना विलंब किये अपनी अपनी लुगाई अरे भाई लुगाई नही रजाई की और चल दिये। 2 बज चुके थे और सुबह 5 बजे उठना था। इस लिए मैं जल्दी से अपने बिस्तर पर लेट गया और मेरी रजाई ने मुझे आलिंगन कर लिया ।

लगभग 4:30 बजे थे। कोई कमरे का गेट जोर से खटका रहा था।भानू ने उठकर देखा तो वार्डन सर थे। तेजी से बोले" उठ जाओ आशिको और जल्दी से असेमब्ली में चलो " ,वार्डन के जाने के बाद उनके लिए चार गालियाँ देने के बाद सभी लोग तैयार हुए और पहुँच गए ग्राउंड को साफ करने।हमने लगभग 6:30 तक ग्राउंड को साफ कर दिया था। उसके बाद वापस हॉस्टल जाते टाईम अवनी मिल गयी। उसने कहा "स्वप्निल, मैं और राशि आज कॉलेज की परेड के बाद मूवी देखने जायेंगे तुमको भी चलना है "। मैंने कहा यार मुझे कपड़े धुलने है। "वो हँसी और बोली, प्लीज यार चल ना अब दिन ही कितने बचे है साथ मे बिताने को"। मैंने कहा "ठीक है चलूँगा"। दस बजे मैं कॉलेज आ गया था। ध्वजारोहण के समय  राष्ट्रगान हमेशा से मेरे खूबसूरत पलो में शुमार था। क्युकी यह पल प्रत्येक भारतीय के दिल सबसे करीब होता है।कुछ कार्यक्रम होने के बाद बूंदी के लड्डू का वितरण हुआ। ये बूंदी के लड्डू भी हमें जाने अंजाने मे  एक सीख दे जाते है। कि एक बार टूटने के बाद किसी भी चीज में वो पुरानी बात नही रहती। फिर चाहे दोबारा उसे कितने भी प्यार से संवारा जाए। 

मैं बूंदी के लड्डू की लाइन में अपनी बारी का इंतजार कर रहा था तभी अवनी ने सामने आकर इशारा किया पर मैंने उसको कुछ समय इंतजार करने के लिए कहा। 5 मिनट बाद मुझको बूंदी के लड्डू का प्रसाद मिल गया।  अवनी बोली यार इतना क्या जरूरी था ये लड्डू के लिए 5 मिनट बर्बाद करना। मैंने उससे कहा चलते चलते बताता हूँ " अवनी तुझे पता है कि हमारे यहाँ दिवाली, होली पर अगर कुछ चीज बांटी जाती है। तो लोग उस प्रसाद समझ कर लेते है "तभी अवनी बोली " ऐसा तो मेरे यहाँ भी होता है पर इससे इसका क्या संबंध " मैंने कहा ये भी तो राष्ट्रीय पर्व है। तो ये बूंदी का लड्डू भी तो प्रसाद ही हुआ। तभी अवनी थोड़ी उदास हुई और उसने मेरे हाथो से थोड़ा लड्डू लेकर खा लिया । हमारे सामने राशि आ गयी थी। मैंने पूछ कौन सी टॉकीज में  चलना है तो अवनी बोली "पी वी आर मे  और मैंने टिकिट भी बुक कर ली है " अवनी की यही बात अच्छी थी। वो हमेशा हर काम के लिए पूरा प्लान बना के रखती थी। हम लोग पी वी आर पहुँच चुके थे। मैने पोस्टर की तरफ देखा तो मूवी का नाम लिखा था "हाफ गर्ल फ्रेंड" बेस्ड ओन चेतन भगत बेस्ट सेलिंग नोवेल। . 

तीन बज चुके थे और हम लोग मूवी हॉल के अंदर थे। कुछ व्यवसायिक विज्ञापनों के बाद शुरू हुई चेतन भगत के बहुचर्चित उपन्यास "हॉफ गर्ल फ्रेंड " पर आधारित फिल्म मुख्य नायिका की भूमिका में हमारे बचपन के विलेन शक्ति कपूर की बेटी श्रद्धा  ने देहली की हाई सोसायटी की लड़की रिया सोमानी का किरदार निभाया था और एक तरफ स्पोर्टस् कोटा से भर्ती हुए अंग्रेजी की ऐसी की तैसी करने वाले  बिहार के बबुआ माधव झा का किरदार निभा रहे थे अपने पानीपत वाले अर्जुन कपूर। बरसात से शुरू हुई इस फिल्म ने इंटरवल तक हमे रूला दिया था । अवनी बार बार पूछ रही थी "का स्वप्निल बबुआ कछु बुझात की नही " मैं अचंभित था की अवनी भोजपुरी बोल रही थी। वरना" बी एच यू कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग" के प्रांगण में हम आज तक नही सुने अवनी के मुँह से भोजपुरी, मानते हैं की पूर्वांचल पर भोजपुरी भाषा का प्रभाव है परंतु अवनी जैसी साउथ देहली की लड़की से इतनी लयमय भोजपुरी। 

तभी अवनी ने बताया उसकी माँ बिहार के बक्सर जिला से हैं। रिया सोमानी माधव झा को अपनी शादी का कार्ड देने आयी थी। इंडिया गेट पर फिल्माया गया ये दृश्य वास्तव मे देखने लायक है। रिया सोमानी की आँखो से आँसू निकल रहे थे और इसी के समांतर अवनी की भी आँखे नम हो रही थी।तभी मुझे अपनी अंगुलियों पर किसी का स्पर्श प्राप्त हुआ। अवनी ने मेरी हथेली को अपनी नर्म हथेली से जकड़ लिया था पर उसका ध्यान सिर्फ फिल्म के उस सींन पर था जब रिया माधव से दोबारा पटना में क्लोजअप के ऑफिस मे  मिलती है। अवनी ने मेरे सिर पर अपना कंधा रख लिया। राशि इस पूरे दृश्य को अपनी निगाहों को तिरछा कर देख रही थी। मैं जानता  था कि मुझे अवनी से प्रेम था। प्रेम जिसे मैं अपनी वाणी के शब्दों से भी बयाँ ना कर सकता था पर मेरी हर कोशिश के समक्ष हरिद्वार मे  माँ गंगा किनारे अवनी का वो वादा " स्वप्निल एक वादा करो मुझसे, क्या तुम मेरे दोस्त की तरह यूँ ही मेरे हर सुख दुख मे मेरा साथ दोगे" प्रतिरोध था। अवनी के आँसुं उस समय हमारी हथेलियों के बीच गिरे जब माधव ने रिया को वापस एक रेस्ट्रो में "स्टिल अ लिटिल लोंगर विथ मी " गाते सुना, फिल्म समाप्त हो चुकी थी पर अवनी के आज के इस व्यवहार ने मेरे समक्ष उन प्रश्नो को फिर से नये सिरे से उत्पन्न कर दिया था। जो मैंने हरिद्वार में उस वादे के वाद विसर्जित किये थे।ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो प्रश्न जो मैने हरिद्वार में माँ गंगा के चरणो मे विसर्जित किये थे। वो गंगा के मैदानी क्षेत्रों से अनुभव लेकर आज फिर इस काशी की गंगा से निकल कर मेरे समक्ष खड़े होकर मुझे प्रश्न वाचक नजरों से देख रहे हों। 

.शायद 6:45 का समय हुआ था जब हम लोग अवनी के हॉस्टल पहुंचे थे। मैंने ऑटो वाले को किराया दिया फिर अवनी को मूवी के लिए थैंक्स बोला। ये थैंक्स सिर्फ मूवी के लिए ही नही बल्कि अवनी द्वारा मेरे हाथ को थामने और  मेरे कंधे पर सिर रखने के लिए भी था। अवनी बोली "स्वप्निल तू थैंक्स कब से बोलने लगा और मुस्करायी "। " जब से तुमने फ्री की मूवी दिखाना शुरू की है " मैंने उत्तर दिया। तभी राशि बोली "चल अवनी लेट हो जायेंगे" और मेरी तरफ देख कर बोली "स्वप्निल बाय"। "बाय " मैंने उत्तर दिया  और अपने हॉस्टल की और निकल आया। लगभग 7:20 तक मैं हॉस्टल गेट पर पहुँच गया था। तभी भानू और हमारी छत वाली महफ़िल के मुख्यकार्यकर्ता ने मुझे आवाज लगाई और दोनो मेरे पास आकर बोले कि " कल अर्नेब का जन्मदिन है हम लोग केके लेने जा रहे हैं। तुम सब लोगो को बता दो और "GPL" के लिए सबको तैयार कर लो"। "हाँ बता दूंगा मैं हूँ सबको" मैंने उत्तर दिया। हॉस्टल में जाकर मैंने सबके रूम में यह खबर फैला दी और  "GPL" के लिए सब तैयार रहे ये कह दिया।

 "GPL"

प्रत्येक  हॉस्टल में दी जाती है इसके लिए कुछ मुख्य अवसर घोषित होते हैं जो हॉस्टलर अपने मन के हिसाब से बना लेते है जैसे - किसी के नम्बर ज्यादा आना, किसी की प्रेम कहानी की शुरुआत होना, प्लेसमेंट होना, नये कपडे आने पर, नई हेयर स्टाइल कटाने पर और जन्म दिन के दिन तो ये सेवा बिना किसी प्रतिरोध के दी जाती है। ये सेवा प्राप्त करने वाला व्यक्ति कुछ समय के लिए अपनी जिंदगी मे होने वाले इस शुभकार्यों के लिए खुद को कोसता है। 

रात के 11: 55 हो चुके थे। हॉस्टल में चारों तरफ अफरा तफरी मच गयी थी। सभी लोग अपने हाथो में चप्पल और जूते लिए हुए थे। अर्नेब इस समय समझ चुका था कि कोई भी प्रतिक्रिया उसके लिए इस समय घातक हो सकती है। इसी लिए अर्नेब अपनी तशरीफ को अपने हाथो से  छिपा रहा था। 12 बज चुके थे तभी चप्पलों और जूतों की बौछारों के बीच अर्नेब की आवाज दब गयी थी। थोडी देर बाद हम लोगो ने केक काटी और कुछ देर में वो केक हम सबके मुँह पर थी तभी अर्नेब के मोबाईल की घंटी बजी, अंतिमा का काल था। 

अर्नेब ने कॉल उठाया और हम लोग बात सुनने उसके पीछे चले गए। आज ये पहली बार था। जब अर्नेब ने हमें मना नही किया था या हमे गाली देकर भगाया नही था। रिश्ते भी काँच या मिट्टी के बर्तनो के समान होते है। जब तक टूटते नही तब तक हम उनको सबसे बचाकर रखते है और जब एक बार टूट जाते है या उनमे हल्की दरार आ जाती है। तो हम उनके प्रति लापरवाह हो जाते है। अर्नेब भी कोशिश करता था। उसे भुलाने कि पर अर्नेब के लिए उसको भूलना शायद अपने जिंदगी के इन 20 सालों के भूलने के समान था। क्युकी वो उसके बचपन की दोस्त थी या कहूँ कि उसका बचपन थी ।उसी ने तो सिखाया था अर्नेब को क्लास में आगे बैठना । यहाँ तक की उसे अर्नेब की पसंद और ना पसंद सब पता था। अर्नेब के बचपन से लेकर इस इंजीनियरिंग में आने तक के हर संघर्ष और हर्ष में अवंतिका उसके साथ थी।

पता नही क्यों लड़कियां नही तलाशपाती अपने बेस्ट फ्रेंड मे वो शक्स जो उनकी जिंदगी में रंग भरता है। क्यों वो अपना लेती हैं। ऐसे शक्स को जो उन्हे प्रेम से कोसो दूर रखता है और यातनाएं देता है। जिसे ना उसकी पसंद का ख्याल रहता, न ही  उसका, मैं यह नही कह सकता कि हर लड़की के साथ ऐसा होता है या हर लड़का ऐसा करता है पर जो भी करता है। आखिर वो क्यों करता है।  क्यों दब जाते है? धर्म और जाति के नीचे दो प्रेम करने वाले, क्यों जातियाँ इंसानियत से उपर हो जाती है। क्यों एक पिता सामाजिक मजबूरी में आकर बचपन मे जिस बेटी के सपनो को पूरा करने की सौगंध खाता एक उस बेटी और उसके सपनो की हत्या कर देता है । क्यों नही समझते माँ बाप कि समाज से जरूरी उनके पुत्र पुत्री और उनके सपने है। 

और क्यों नही समझते वो बच्चे भी जो आकर्षण को प्रेम की परिभाषा दे देते हैं।  क्यों नही समझते ये बच्चे कि किसी  की मांग भर उसके साथ सात फेरे लेना ही शादी नही होती ,शादी होती है उन सात फेरों के वक्त लिए सात वचनो को निभाना, पर होता क्या है? प्रेम और जाति, समाज के युद्ध मे प्रेम हार जाता है। प्रेम हार जाता है  तलाक के समय, किसी बच्चे के द्वारा माँ बाप को घर से निकालते समय, जीतता है समाज और इसकी जातियाँ। प्रेम हार नही मानता और उठ जाता है। किसी और ह्रदय  में और ललकारता है। जातियों और समाज को फिर से, और एक लड़की पाती है वही प्रेम फिर से अपने पिता से , भाई से, मित्र से और अपने जीवन साथी से। इन्ही में से एक प्रेम था। जो अर्नेब और अवंतिका के बीच एक सेतु का कार्य कर रहा था।

 अर्नेब ने मोबाइल पर बोला "हेल्लो हाँ बताओ" " हैपी बर्थडे अर्नेब "अवंतिका ने कहा।, " थैंक्स अब्बू " अर्नेब ने कहा, "कल सुबह मिलना है तुमसे ,टाईम है" अवंतिका ने कहा,। "अब्बू अब तू भी टाईम मांगेगी" अर्नेब ने कहा और बोला "कल मिलते है, एंड थैंक्स फॉर विशिंग , गुड नाईट"अब्बू । हाँ प्यार से अवंतिका को अर्नेब अब्बू ही बुलाता था। वो बोलता था की अवंतिका ने बचपन से मेरी हर विश पूरी की है।  जैसे अब्बू करते है। अर्नेब की माँ मुस्लिम और पापा हिंदू है। इस लिए वो अम्मी को मम्मी और पापा को अब्बू बोलता था। अर्नेब खुश था। वो ही मुस्कान फिर थी, उसके चेहरे पर।वैसे लड़कियां भी भगवान सी होती है। कभी भी किसी को खुशी और आँसू देने की योग्यता रखती है।चाहे वो किसी की होठो की मुस्कराहट बन कर हो या फिर उस मुस्कराहट को आँसुओं मे  बदल कर। हम सब लोग अपने अपने रूम मे आ गये थे। मैंने अपनी रजाई को ओढा ही था ,तभी मेरे मोबाइल पर मेसेज की आवाज  आयी , मैंने चेक किया तो अवनी ने 😘 कि इमोजी भेजी थी। मेरा सुलझा हुआ दिमाग फिर से प्रश्न करने लगा जो जायज थे "आखिर क्यों लड़कियां इतना हक जताने के बाद फिर कहती है, तुम कौन से हक से ये बात कर रहे हों"।

फरवरी का महीना शुरू हो चुका था। ये महीना हजारों दिलों के टूटने का बोझ अपने कंधे पर लिए सदियों से जी रहा है क्युकी इसको पता है कि दिल तोड़ने के साथ साथ ये उन दिलो को जोड़ता भी है। जो समाज में इसकी गरिमा को बनाये रखेंगे। गुलाब की कीमतें इस महीने में आसमान को छू लेती है। क्युकी लोग इसका प्रयोग अपनी अपनी प्रेमिकाओ को , जिन्हें वो अक्सर चाँद कहते है, को लुभाने में करते है।कई गुलाब, ख्वाब पूरे करते है। कई गुलाब ख्वाब तोड देते है। टूटना हमेशा ह्रदय को आघात पहुँचाता है फिर भी ना जाने क्यूँ लोग आसमान में टूटते हुए तारों से दुआएं मांगते है।बचपन में दादी कहती थी "स्वप्निल जो व्यक्ति टूट जाता है ना,उसकी हाय और दुआए दोनो असरदार हो जाती है। आज ऐसा ही लगता है।

7 फरवरी की सुबह थी हॉस्टल के बाग में लगे गुलाब गायब हो चुके थे। सात दिन तक चलने वाले इस प्रेम के त्यौहार का आज पहला दिन था। आज गुलाबों  से सजे बुके और खुद को गुलाबों सा निखारती हुई लड़कियां ही नजर आ रही थी सड़को पर और उन गुलाबों की खुबसुरती पर मंडराते भँवरे।सड़को पर कई फूल बिखरे हुए थे। मुझे  इस समय फूलो की दुर्दशा देख छायावाद के कवि माखन लाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा की पंक्तियाँ" चाह नही, मैं सुरबाला के घहनो में गूंथा जाऊँ, चाह नही मैं विधप्यारी को लल चाऊँ" याद आ रही थी, तभी पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा "स्वप्निल, मुझे एहसास हो गया था कि ये अवनी ही है। मैं पीछे मुड़ा तो देखा गुलाबी ड्रेस में गुलाब लग रही अवनी, मेरे सामने खडी थी और मैं भँवरो सा उसके पास खड़ा हुआ था। प्रेम रोग भी ऐडी  की चोट जैसा होता है, जब तक खुद को ना लगे तब तक दूसरे के हालात समझ ही नही आते.। ... 

चमकदार छोटे छोटे सितारों से सजी अवनी की गुलाबी ड्रेस, माथे पर छोटी सी गुलाबी बिंदी और कानो मे गुलाबी नख से जड़े झुमके, अवनी और मेरे प्रति उद्दीपन को प्रकट कर रहे थे। तभी अवनी ने कहा, " कहाँ खो गए मिस्टर स्वप्निल, मैंने मन में बड़बडाते हुए कहा, "तुम्हारी आँखो में', अवनी ने शायद पढ लिया था मेरे मन को।  वो मुस्करा कर बोली "तो बताओ किसी लग रही हूँ मैं,। मैंने हँसते हुए कहा ,"कतई जहर"। वो हंसती रही कुछ मिनिटो तक फिर बोली, "तो मिस्टर स्वप्निल मेरे लिए रोज वगैरा नही लाये।

मैंने अवनी की इस फरमाईश को सुनकर ,उसका हाथ थामकर ,उसे डायेरेक्टर ऑफ़िस के सामने वाले बाग में ले गया। जहाँ गुलाब के फूल खिले हुए थे। अवनी  को उन फूलों का स्पर्श  कराते हुए मैंने उसे छायावाद के कवि माखन लाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा की पंक्तियाँ" चाह नही, मैं सुरबाला के घहनो में गूंथा जाऊँ, चाह नही मैं विधप्यारी को लल चाऊँ.... हे वनमाली देना मुझे उस पथ पर फेंक,मातृ भूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ पर जावे वीर अनेक",अवनी मुझे देख रही थी और वो खामोश थी । खामोशी अधिकता के पश्चात आती है और अधिकता तो संघर्ष से या संघर्ष के समय मिलती है। अवनी खुश थी। शायद उसे पुष्प की अभिलाषा समझ आ गयी थी, जिसके आगे उसकी अभिलाषा बहुत ही छोटी थी। 

जब हम किसी की ख्वाहिश के लिए अपने ख्वाहिश को भुला देते है। उस दिन प्रकृति का एक हिस्सा बन जाते है। क्युकी देने की भावना ही तो प्रकृति है। थोडी देर बाद हम लोग कैंटीन पहुँच गये। आज कैंटीन में केक और लड़को की जेब दोनो  कट रही थी। मगर फिर भी चारों तरफ खुशी का माहौल था। मगर अवनी इन सभी से अलग थी जो रुपयो के मामले मे बिल्कुल निष्पक्ष व्यवहार रखती थी। हमारी इसी बात पर तो झगड़े होते थे कि इस बार बिल में पेय करता हूँ पर अवनी अपना हिस्सा नही देने देती थी किसी को। शायद उसे लगता था कि किसी के बिल को चुकाने से हम उसके दिल के करीब हो जाते है पर अवनी तो मेरे करीब पहले से ही थी। समोसा और पेस्टीज खाने के बाद हम चल दिये, लेक्चर लेने पर अवनी ने कहा"स्वप्निल चल यार लंका होते हुए,अस्सी घाट चलते है, मैंने सिर हाँ में हिला दिया और हम निकल पड़े अस्सी घाट की ओर..... 

.... #जलज कुमार राठौर

"क्लीनिक प्लस वाली"

 प्रस्तावना: ये कहानी छोटे से कस्बे में रहने वाले दो 16 साल के बच्चों की है। प्रेम की अलग अलग परिभाषाओं की सहायता से समाज के बनाए रास्तों पर...