Monday, 30 November 2020

तुम्हारा स्कार्फ




यार कॉमरेड,

मुझे नही पता क्यों उस वक्त तुम मुझे अपने दिल की हर बात बताती थी,और मैं भी बेफिक्र होकर अपने सारे राज तुम्हारे दरमियाँ खोल देता था। मुझे नही पता हमारे दरमियाँ क्या रिश्ता था पर कुछ तो था। वरना यूँ तुम्हारा मेरे लिए और मेरा तुम्हारे लिए इंतजार करना यूँ ही तो न था,घने कोहरे के बीच ,यूँ कड़कडाती सुबहों के बीच, तुम्हे देखना मेरे लिए किसी तापीय उष्मा से कम ना था। यूँ तुम्हारे साथ ,साईकिल होते हुए भी पैदल चलना मेरी आदतों और ख्वाहिशो में शुमार हो चुका था। हमारे बीच की वो साईकिल उस प्रतिरोध की तरह थी जो किसी चालक में तापीय उष्मा उत्पन्न करती है।वैसे वो तुम्हारा मधुवनी कला वाला रंगबिरंगा स्कार्फ लगा कर जब तुम आती थी। तो मै सोचता था। क्या तुम्हारा स्कार्फ मुझसे भी खुशनसीब है पर सर्दी बीतने का बाद गलत फहमी धीरे धीरे दूर हो गयी थी। वास्तव में सर्दियाँ प्रेम के लिए महत्व पूर्ण मौसम है।ये मौसम आपके धैर्य और आपके संस्कारों की परीक्षा लेता है। उसे घने कोहरे में ना जाने कितनी दफा हमारे दस्तानो से सुरक्षित ,हाथो का स्पर्श हुआ और तुमने हर बार मुझे देखा था। एक विश्वास था। तुम्हारी आँखों में मेरे लिए ,जो मैं अक्सर देखता था। जब तुम सिर्फ खामोश हो कर, मेरा हाथ अपने हाथ में थाम लेती थी। बस उसी विश्वास को कायम रखने के लिए के लिए मैं इंतजार करता था। तुम्हारा उस चौराहे पर जहां से हमारे रास्ते अलग होते थे।ताकि रात होने से पहले हम साथ में घर जा सके, वरना मालूम मुझे भी था ,कि एक दिन मैं भी तुम्हारे लिए उस मधुवनी कला वाले स्कार्फ जैसा हो जाऊंगा। जब तुम्हारी उम्र रूपी सर्दी का मौसम बदलेगा पर सच में मैं नही जानता था कि सब कुछ मालूम होते हुए भी मैं तुमसे इतना प्रेम क्यों करता हूँ। 

तुम्हारा दोस्त

........ #जलज राठौर

#चिराग_बाती....

 #चिराग_बाती....

"#दिवाली का त्यौहार सभी की जिन्दगी में खुशियाँ और तोहफे लेकर आता है। मुझे भी एक नायाब तोहफा दिया था उस खुदा ने #उससे उस हसीन मुलाकात का..

घर में माँ लक्ष्मी की पूजा सम्पन्न होने पर माँ ने कहा "चिराग इन दियो को छत पर रख आओ। "

आज के दिन मैं एक सस्कांरी बेटा था। इसी लिये मम्मी की पहली आवाज पर ही दियो से सजी थाली मेरे हाथ में थी। मैं छत पर पहुँच कर दियो को एक करके सजा रहा था। तभी नजर  घर के पीछे वाले घर पर पडी।मेरी हमउम्र एक लड़की जिसने गुलाबी साडी पहनी हुई थी।  बार -बार एक दिये को दूसरे दिये के सहारे जलाने की कोशिश कर रही थी। वो दिया तो नही जल रहा था मगर एक आग इस दिल मे जरूर प्रज्ज्वलित होने लगी थी। हो भी क्यो ना वो बार बार अपनी जुल्फो को कानो तक का रास्ता जो मुकम्मल करा रही थी। सच बताऊँ तो मेरी दीवाली तो बन चुकी थी। मैं धीरे से उसके पास गया और दोनो हाथो से उसके दूसरे दीपक को सहारा दिया। वो जल उठा। वो लडकी खुश हो गयी और थैंक्स बोल कर चलने लगी, मैने पूछा आपका नाम क्या है। वो बोली "जिसके बिन आप अधूरे है। मिस्टर चिराग ठाकुर.."बाती".

उस वक्त मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी और मैं अपने बचपन की पुरानी यादो में डूब चुका था। क्या वही बाती....जब छत से नीचे आकर मम्मी से पूछा तो मम्मी ने कहा हाँ बेटा ये शर्मा अकलं की बेटी #बाती है। जिसके साथ तू बचपन में खेलता था और स्कूल जाता था। अपने नाना जी के घर से आज दस साल बाद आयी है। वही पढकर ENGINEERING कर रही है। बस फिर क्या चेहरे पर जो मुस्कान थी वो मेरी पहली मोहब्बत की पहिचान थी। माँ ने कहा चिराग, बाती के घर मिठाई दे आओ ...मैंने अलमारी से एलबम में से हमारा पुराना फोटो निकाला और उसके पीछे अपना नम्बर लिख कर पैक करके बाती के  घर दौडकर जाने लगा तो माँ ने आवाज देते हुए बोला "मिठाई तो  ले जा"। वैसे तो बाती का  घर मेरे घर से दूर ना था पर ना जाने क्यूँ आज ये मीटरो की दूरी मीलो सी लग रही थी। मैंने बाती के घर के सामने पहुँच कर खुद को संभाला फिर डोर वेल बजायी। बाती ने दरवाजा खोला उसके चेहरे पर एक हँसी थी। पल भर के लिये मुझे ऐसा वो मेरी जिन्दगी है। अक्सर होता है प्रेम में होने पर जब हम मुस्कानों के सहारे प्रेम व्यक्त करते हैं। थोडी देर में अन्दर से आन्टी की आवाज आयी बाती कौन आया है। 

बाती बोली "मम्मी.....चिराग"।

आन्टी ने मुझे अन्दर आने को कहा और मिठाइयों से सजी टेबल पर बैठा दिया। 

मिठाईयो की मिठास के साथ हम लोग पुरानी मीठी यादो का स्वाद लेने लगे। 

मैं बाती और मेरी बचपन की फोटो को बाती से छिपा रहा था आन्टी से, लेकिन बाती मेरी हरकतो को महसूस कर रही थी। मैंने आन्टी को हमारे परिवार की तरफ से दीवाली की शुभकामनाये दी और पैर छूकर चलने लगा। 

आन्टी ने कहा "बाती चिराग को गेट  तक  छोड आओ।" मैं और बाती गेट तक आ चुके थे। मैंने हिम्मत नही कर पायी कि वो फोटो उसे दे दूँ। मैं अपने घर की ओर वापस चलने लगा।

तभी बाती बोली "ओय चिराग मेरा गिफ्ट तो देते जा" मैंने दौडकर उसे गले लगा लिया। उसने भी मुझे अपनी बाँहो में भर लिया था उस वक्त मुझे दुनिया की हर चीज खाली लग रही थी। आस पास के शोर को देख हम एक दूसरे से अलग हुए।बाती ने मेरे हाथ पर अपना नंबर लिखा फिर मैने उसे हमारे बचपन वाली वो फोटो दी और घर आकर उसे फोन लगाने बैठ गया। दो काल के बाद किसी ने नही उठाया। लगभग एक घंटे बाद मेरा फोन बजा। मैंने उठाया उधर से  आवाज आयी "चिराग?"। 

बस फिर  क्या हमारी बचपन की पुरानी यादो की किताब का हर पन्ना हम पलटने लगे 

रोज हम बाते करते बीते वक्त की।पुराने किस्सों की। 

आज जब फोन किया तो बाती थोडी उदास थी। वो बोली चिराग कल में नाना जी के यहाँ वापस जा रही हूँ।मेरी सारी खुशी गम मैं बदल गयी। 

बाती से मैंने कहा "मुझे तुमसे कुछ कहना है। " बाती ने कहा बोलो पर मैं उस वक्त हिम्मत न कर पाया और काॅल कट गयी। 

मैं सुबह लेट उठा तो देखा रूम में सूरज की रोशनी मेरे कमरे में थी। बाती सोफे पर बैठी थी। मैं बोला "अरे! बाती तुम तो नाना जी के यहाँ जा रही थी,गयी नही। वो बोली तुम कुछ  कहना चाह रहे थे कल,ल इसलिए सोचा तुमसे बात करके ही जाऊँ। मैंने बोला "हाँ बाती बात तो करनी है तुमसे  और मैंने अलमारी से वो अगूँठी निकाल ली जो माँ ने दिवाली गिफ्ट में बाती को देने के लिये दी थी। मैं बाती के पास आकर घुटनो तले बैठकर उसकी हथेलियों को थाम उसकी आँखो में देखकर बोला बाती "I love u"

बाती के आँखो से आँसू आ गये थे। पहले वो बोली "कल ही बोल देते यार फिर 

बोली चिराग "आई लव यू टू यार "

पर सोच ले, बाती  सिर्फ दिवाली तक ही चिराग को रोशन करती है। मैने हां मैं सिर हिलाया और उसका हाथ उसे अगूँठी

पहनाने के लिये थामा तो वो मेरे सामने से ओझल हो गयी। मुझे कुछ समझ ना आया मैं रूम से दौडकर बाहर आया तो देखा माँ घर पर नही है। रामू काका ने कहा वो शर्मा जी के घर गयी है। मैं दौडकर शर्मा अंकल के घर गया। माँ को देखा और बोला माँ बाती अभी घर आयी थी। मेरे छूते ही वो गायब हो गयी। माँ ने मुझे अपनी बाँहो मे पकड कर, सामने खामोश सोती बाती को दिखाया। मेरी आँखो के आँसू थम गये। 

माँ ने बताया "आज सुबह नाना के घर जाते हुए बाती का एक्सीडेन्ट हो गया. सच में बाती चिराग को दिवाली तक ही रोशन करती है। आज भी चिराग बिन बाती सा बुझा हुआ है।....

.....#जलज_राठौर "इटावा"

"क्लीनिक प्लस वाली"

 प्रस्तावना: ये कहानी छोटे से कस्बे में रहने वाले दो 16 साल के बच्चों की है। प्रेम की अलग अलग परिभाषाओं की सहायता से समाज के बनाए रास्तों पर...