Saturday, 11 April 2020

"परिपक्व प्रेम"


                                                   "परिपक्व प्रेम"




बात है २6 जनवरी 2018 की जब मैं यानी कमल अपने दोस्तो के साथ अपने कॉलेज की परेड देखने science faculty ground में गया था,
वैसे तो कोई खास कारण ना था, जाने का ,पर दोस्त की girlfriend March past का हिस्सा थी इसलिए उसके साथ जाना पडा, परेड खत्म होने के बाद वो अपनी gf से बात करने लगा। मैं भी साइंस और कॉमर्से faculty के बीच जो पार्क था वहाँ किनारे खड़ा हो गया।
तभी पीछे से किसी के हसने की आवाज आयी। पीछे देखा तो एक चमक नजर आयी ,सूरज की रोशनी उस लड़की के चेहरे को और चमकदार बना रही थी, वो अपनी जुल्फों को बार बार कानों का रास्ता मुकम्मल करा रही थी उस वक़्त मेरा हाल प्रभू  राम जैसा था जब उन्होंने वन में सीता जी को दखा था मानता हूँ मैं कि मैं उस समय प्रभू राम के चरित्र की धूल मात्र भी ना था पर कहते हैं प्रेमिका के समक्ष  हर प्रेमी अबोध बालक सा हो जाता है  और बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं अरे में भी आध्यात्मिक हो गया पर सच में उस वक्त मैं सिर्फ उसको देखे जा रहा था। मुझे नही पता वो कौंन थी पर उसकी बेबाक हँसी, मेरे चेहरे की मुस्कान की वजह बन गयी थी।
मुझे नही पता ये मोह था। आकर्षण था या प्यार मगर मेरा पूरा हफ्ता उसका नाम,  फैकल्टी और कोर्स पता करने में लग गया पर मुझे हार का सामना करना पड़ा।
हार व्यक्ति से उसका साहस छीन लेती है इसी कारण अन्तत:  मैं अपने हॉस्टल में आकर बैठ गया। उस दिन  दास सर की इलेक्ट्रीकल मशीन की क्लास थी मेरा मन नहीं था क्लास लेने का पर कमीने दोस्त कहीं भी ले जाते है दर्श बोला चल भाई श्री खंड और फ्लेवर मिल्क पीने चलते हैं मिल्क पीकर हम क्लास को जाने लगे क्लास मल्टीमीडिया के हाल में लगने वाली थी हम थोड़ा पहले पहुँच गए थे इस लिए मैं क्लास में खिड़कियों के सहारे बैठ गया।  खिड़की सर्दी के कारण बन्द थी और रात भर हॉस्टल में ओपन डे की तैयारी को जागने के कारण
मुझे  हल्की हल्की नींद आ रही थी झपकती पलको और खिड़की के शीशे से अचानक मैंने देखा पार्क में वही लड़की अपनी  दोस्त के साथ खडी थी और उसकी वह दोस्त  मेरे एक NCC वाले दोस्त की फ्रेंड  थी, उससे बात करने के लिए और  क्लास से बाहर जाने के लिए  मैंने नींद आने का नाटक किया। दास सर ने देखा और तुरंत बोले मैं आज ज्यादा सीधा दिख रहा हूँ क्या? मैंने ज्यों ही उनकी तरफ देखा बोले बेटा जाओ बाहर जाओ  attendance के नम्बर तो आपको मिल ही रहे है फिर ये एहसान क्यूँ,
Finally मै क्लास से बाहर था  और मैं दौड़ कर पार्क की ओर गया मगर मैं आज फिर उदास था क्योंकी वो जा चुकी थी, वक्त बीतता गया मैंने अपने दोस्त की फ्रेंड से बात की और उसके बारे में बताया और पूछा भी तो उसने यही कहा की प्लीज़ उसे तंग मत करो,
गलती उसकी भी नही थी वो मुझे समझ नही पाई थी उस वक्त ,पर धीरे धीरे जब वो मुझपे विश्वास करने लगी तो उन्होंने मुझे उसका नाम बताया.#
नाम शिव की अर्धांगनी का था और उतना ही प्यारा जितना की वो..
मैंने उनसे कहा कि अब तो बात करवा दीजिये उससे परंतु उन्होंने कहा की उनकी दोस्ती खराब हो जाएगी मैं उनको समझ सकता था इसलिए मैंने उन्हे परेशान नही किया और.उस पागल को अपना दोस्त बनाने के लिए अलग रास्ता निकालने की सोचने लगा।
31 जनवरी  2018 थी  और कॉलेज में OPEN DAY  था में सेंट्रल ऑफिस से गुजर रहा था तभी मैंने उसे देखा ,रोज से आज ज्यादा खूबसूरत थी,  मगर उसके साथ एक  uncle, aunty और एक लड़का था थोडी देर बाद जब मैं उसके करीब गया तो देखा की वो जो लड़का था वो तो मेरे हॉस्टल का था।
मैं समझ गया की वो उसकी बहन है। और वो मेरा दोस्त भी था इसलिए अब मेरे पैर थोडे पीछे हो गए मैं वापस हॉस्टल चला गया और ये सही होगा या गलत होगा इसके बारे में सोचने लगा जब कोई बात समझ नही आये तो मैंने उसके बारे मे सोचना  ही बंद कर दिया  था। पर उसकी मसूमियत और वो बेबाक हँसी वाली अदा इस दिल मे समां चुकी थी मैं लाख कोशिशो के बाद भी उसको भुला नहीं पा रहा था.......
जब मेरे दोस्त ने उदासी का कारण पूछा तो  मैंने उसे पूरी बात बताई उसने मुझे समझाया की तूने जानबूझकर तो ये सब किया नहीं अब अगर तुझे वो अच्छी लगती है तो इसमे तेरा क्या कसूर पर मन फिर भी नही मान रहा था की दोस्त की बहन से प्यार लेकिन उस वक्त मुझे राह दिखाई चेतन भगत के नोवेल "Three mistakes of my life "ने जिसमे बताया की  अगर किसी के लिए तुम्हारी सोच सही हो तो खुदा हर गलती को माफ कर देता है अब मुझे तो पता नही था कि मेरी उसके लिए फिक्र सच्ची है या झूठी, पर इतना जरूर था की उस पागल लड़की के लिए इस नादान दिल में कभी गलत ख्याल नही आया थाअब मैं जब भी क्लास लेने जाता तो वो नजर आ जाती। अक्सर यही होता है जब हम किसी से दूर जाना चाहते हैं तो वक़्त उसे हमारे करीब लाता है वक्त गुजर रहा था और मैं उसे अपना हाल ए दिल बताने को तरस रहा था मई में हमारे पेपर खत्म हुए और , हम सभी  industrial training पर जाने लगे थे मैं  बनारस गया था और अब उसकी कोई खबर ना रहती । उसकी याद जब भी आती तो मैं उदास हो जाता फिर एक दिन fb चलाते हुए उसकी एक दोस्त से बात हुई नाम था एकता,मैं उस से उसके हाल चाल पूछता रहता  धीरे धीरे वक्त बीतता गया एकता और मेरी दोस्ती बहुत अच्छी हो गई पर दिल उस पगली के ख्यालो में ही खोया रहता मेरी तीन महीने की ट्रेनिंग खत्म हो गई थी और अब मुझे इंतजार था उसके दीदार का ,वैसे तो वो कोई चाँद नही थी पर मेरे लिए एक ख्वाव थी जिसे मैं ताउम्र देखना चाहता था आज जब मै लेक्चर लेने गया था तो सुबह इंजीनीयरिंग फैकल्टी के सामने उससे इतने दिन बाद मेरी नजरे मिली आँखों में काजल केसाथ खूबसूरत इतनी की मैं पल भर को थम गया  तभी मेरे दोस्त ने कंधे पर हाथ रखा और बोल, "भाई ध्यान किधर है तेरा". उस वक्त मुझे ऐसा लगा की मेरी नजरो से एक हसीन ख्वाव टूट गया हो। और उसे देखते देखते मैं लेक्चर लेने आगे बड़ गया...
उस दिन तो शायद मुझे उसकी झलक ही मुकम्मल हुई उस दिन के बाद उससे मेरी मुलाकात हो ही जाती थी चाहे वो सुबह सात बजे की क्लास के बहाने हो या
मल्टीमीडिया की कैंटीन में नास्ते के सहारे वक़्त धीरे धीरे उससे मुलाकातों में बीत रहा था जो सिर्फ निगाहों से ही होती थी वो भी कभी कभी नजरें मिला लेती थी मगर हमारे समाज कि यही विडंबना है की हम प्रेम और छल में अंतर स्पस्ट नही कर पाते और अगर बच्चा हमारे अनुसार चलता है तो हम बहुत खुशी होते है कुछ ऐसा ही था हमारे दरमियाँ एक मैं जो हर रोज उसे अपने प्रेम की परिभाषा समझाता परंतु वो हर बार समझते हुए भी अंजान बनती, कुछ था जो उसके और मेरे दरमियाँ दीवार का काम कर रहे थे वो थे उसके संस्कार , भले ही वो संस्कार उस वक्त मेरे दुश्मन बने ही थे परंतु उन्ही दिनों में मैंने सीखा था किसी का इंतजार करना ,किसी से एक तरफा प्यार करना और भी बहुत कुछ जो वो अक्सर मुझे उन मुलाकातों में सिखाती थी वो समझदार तो थी ही पर अपनो के लिए प्रेम और समान और उनके अच्छे बुरे की  समझ उसे और भी समझदार बनाती
थी अब मैं थक गया था उसका पीछा करते करते और मैं युद्ध से पहले हारे हुए एक हताश सिपाही की तरह अपने सपनो रूपी हथियार का समर्पण कर चुका था परंतु उसी दिन   Fb पर उसका नाम Add friend  की लिस्ट में आया मैं पहले तो अचंभित हुआ पर आप तो समझ ही सकते हैं आखिर कब तक हम खुद को सम्भालते और Confirm करने के लिए मैंने उस की दोस्त से पूछ डाला जब उसने कहा हाँ वो अपनी रूममेट के फोन पर चलाती है बस फिर क्या था इस सिपाही को प्रेम युद्ध क्षेत्र में एक आशा की किरण दिखाई दी और इस बार सिर्फ विजय के स्वप्न इन आँखो में थे । अब आप सोच रहे होंगे की मैंने  friend Request चिपका दी होगी पर ना यार सब्र तो हमने बहुत कर लिया था वो भी पूरे 8 महीने का
गर्मियों की राते होती ही अजीब हैं ना खुद सोती हैं ना लोगो को कुछ ऐसा ही हाल था मेरा, जब हमने सीधे" Hii " मैसेज किया था तो पूरे एक दिन बाद उसका reply आया था "Bolo" शायद वो जानती थी मुझे  या जानना चाहती थी जो भी था पर मुझे उन दिनों ये तो पता चला की मुझे कभी उससे बात करनी नहीं आई और  यही कारण था कि इस 15 दिन की दोस्ती पर "Block " नामक ग्रहण लग लगा। आप हंस लो कोई ना हुआ तो तुम्हारे भी साथ था ये 🤣अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया था की मेरे प्रेम की नैया अब डूब चुकी है और शायद ही अब कोई केवट हमको उसके करीब ले जा सकता है अरे केवट को तो जानते ही होंगे आप जिसने राम सिया मिलन को पूर्ण किया था पर आप तो जानते ही हैं ये कलयुगी दोस्त आपको क्या से क्या बना सकते हैं पर वो तो शुक्र है की माँ पिता के संस्कार और टीवी के प्रचार ने पूरा सहयोग दिया हमे सिगरेट और बीयर से बचाने में और हम हमेशा अपने दोस्तों की महफिल में पेस्प्सी की बोतल वाले शख्स रहे तो हाँ नवम्बर और गर्मी दोनो खत्म होने की कगार पर थे और सर्द हवाएं हॉस्टल पर लगने वाली महफ़िल में खलल डालने लगी थी पर हम भी कम ना थे आग को बुझाने वाली बाल्टी में ही आग लगा कर अपने दिल के दर्दों, टीचरों की भडासो और  तकलीफों को जलाते थे और उन दिनों उस महफ़िल में, मैं एक अहम मुर्गा था । कारण था घडी पर लिखी मेरी एक शायरी जो इंजीनीयरिंग और टेकनीकल् और WPT  तक फैल चुकी थी जो Block होने के बाद थोडी इज्जत बच जाती हैं ना जिसमे हम भी अपने साइड से ब्लॉक करदेते हैं किसी को उस इज्जत का भी जनाजा निकल चुका था जब किसी के द्वारा मेरे लिए संदेश आया कि उससे कहो की मेरे बारे में कुछ ना लिखे अब बचा था मेरे पास सिर्फ और सिर्फ सफाई देने वाले कुछ शब्दों का जाल जिसमे  कोई भी नही फंस रहा था अरे मतलब कोई भी मेरी बात नही समझ रहा था,
वो दिसबर की सर्द रात थी लगभग 9 या 10 ही बजे थे मैं खाना खा कर  एंड सेमेस्टर के पेपर की तैयारी करने ही बैठा था तभी मोबाइल पर मेसेज आया
" ek help chahiye"
इस एक मैसेज से मेरे दिल कि धड़कन पर तो कोई असर ना हुआ पर मेरे मैं में प्रश्न जरूर दौड़ा जिसका जवाब भी अगले मेसेज में मिल गया जिसमे उसने मुझसे अपने भाई के  लिए नोटस मांगे थे
और मैं पागल क्या क्या समझ बैठा था पर कर भी क्या सकते हैं हमारे साथ यही होता है हद से ज्यादा किसी की फ़िक्र  उसकी जिंदगी से हमारा जिक्र छीन लेती है परंतु जब उसने pls कहा तो उस  प्लीज शब्द ने हमारे बीच बने पहाड़ को मांझी बन कर तोड़ दिया और मैं उसको नोटस् भेजने लगा।
इसी दरमियाँ फिर हमारी बातें हुई जिनका जबाब सिर्फ ह्म्म और अच्छा में प्राप्त होता। सच कहूँ तो मेरे सब्र का बांध टूट चुका था और में उसे भूलना चाहता था पर काश ऐसा होता कि में उसको भूल पाता कारण यह था कि उसका अक्सर राहों में मिल जाना उसके प्रति मेरे प्रेम या कहो आकर्षण के दीप को पुन: प्रज्ज्वलित कर देता था वक्त के साथ हमारी बातों के प्रश्नो और उत्तरों में शब्दों का उपयोग तो बड़ा परंतु अलंकार और रस का भाव नही था। बात 1 जनवरी २019 की है जब मैंने पहली बार उसके प्रति  अपने भावो को अनुभावो और विभावो के साथ मिश्रित कर लफ़्जों का सहारा लेकर उसको यह बात बताई की "आमी तुमको भालोभाषी" ,आप सोच रहे होंगे कि मै मूर्ख हूँ कि हिंदी भाषी को बांग्ला में प्रेम के  शब्द बोल रहा हूँ तो शायद हाँ हो सकता  क्युकी कभी हिम्मत ही ना हुई उसका हाथ थाम उस अपने सारे जज्बात बताने की, बात डरने की नहीं थी बात थी उसकी छवि की जो शायद हमारे एक दोस्त की तरह भी मिलने से लोगो कीं नजरों में गलत बनती ।
मुझे 3rd Year  के लिए प्रोजेक्ट बनाना था तो हमने एक ग्रुप बनाया जिसमें हम 10 लोग थे इन्ही में से एक उसकी रूममेट थी मैं इस बात से अंजान था एकदिन हम लोग प्रोजेक्ट वर्क कर रहे थे तभी उसने मेरा मोबाइल मांगा मैंने कहा ले यार उसने मेसेंजर खोला और पूछा इसको तू कैसे जानता है 🤣 मैंने कहा बस दोस्त है ऐसे ही, मैंने तुरंत पूछा तू कैसे जानती है उसने बोला मेरे रूममेंट है भी फिर क्या था चेहरे पर थोड़ी उदासी थी परंतु मन प्रसन्न था उम्मीद थी सब और अच्छा होने की। और थोड़ा बहुत हुआ भी पर खाते है की कुछ चीजे दूर से ही सुकूँ देती है कुछ ऐसी ही थी वो मेरी जिंदगी में , बात 30 जनवरी 2019 की है जब मैंने उससे मिलने के लिए पूछा पर क्युकी 31 जनवरी को ओपनडे होता है और सभी 3rd year के विध्यार्थी प्रोजेक्ट लगाते है उसकी बताई जगह पर में गया वो ना थी फिर थक कर और निराश हो अपने प्रोजेक्ट पर आ गया तभी शैलू जो हमारे प्रोजेक्ट की सदस्या थी ने मुझे एक टॉफी दी मैंने उससे बोला बेटा तू भी मजे ले रही है तभी वो बोली पहले ये तो पुछ कहाँ से लायी हूँ तो मैंने गर्दन झुका कर बोला हाँ तू तो घर से लायी होगी वो हंस पडी बोली अपने नहीं पर उसके घर से लायी हूँ जिसके लिए तू यहाँ उदास बैठा है और उसने मेरी गर्दन को दाई और घुमाया वो अपनी मम्मी के साथ  खडी हुई थी वैसे तो सर्दी इतनी न थी पर उस रोज उसे देख सर्दी और गर्मी साथ साथ लग रही थी
खुश था में उसको देख कर, पर वो कुछ बोली ही ना
और उसके बाद ना उसने किसी मैसेज का जबाब दिया ना ही मुझे मिली मैं कोशिश करता की उससे मिल लूँ पर ऐसा हो नही पा रहा था, कि मैंने FB पर देखा कि मैं ब्लॉक कर दिया गया था कारण पूछने का मौका ही ना मिला ना उसने बताया, पर कुछ था जो हर लम्हा उसकी याद दिलाता था,
7 फरवरी 2019 वैलेंटाइनडे के दिनों की शुरुआत थी परन्तू मुझे ये दिन चिढा रहा था क्युकी जिसे साथ होने से इस दिन का महत्व था वो ही मेरे करीब ना थी
मैं पूरे दिन कॉलेज में लेक्चर अटेंड करता रहा शाम को जब हॉस्टल लौट रहा था तभी इंजिनीरियिंग फैकल्टी के सामने रास्ते पर मेरे दोस्त की GF जो उसकी भी दोस्त थी मिली उन्होंने मुझे बताया की आज उसका जन्म दिन है मै खुश हुआ पर करता भी क्या जब रूम पर पहुंचा तो मोबाइल पर मेसेज आया आज उसका जन्म दिन है मैंने नंबर चेक किया तो उसकी रूममेट का था, फिर मैंने सोचा और लिखा सब कुछ उससे पहली मुलाकात, बात जज्बात  और उसकी सहेली को भेज दिया और कहा की उसको देकर मेरी तरफ से हैप्पी बर्थडे बोल दे
और मैं सो गया, सुबह जब उठा तो देखा कि
"Thank u " का मैसेज आया था उसका मैंने भी "वेलकम " लिख भेज दिया। बातें फिर से शुरु हुई और भी चलती रही रोज मिलने के वादे, चाय के लिए मना करना और भी शायद वो मिलना ही नही चाहती थी मुझसे कॉलेज की क्लासेस खत्म हो गयी थी पेपर का और कॉलेज का आखिरी कल आने वाला था
आज मैं मेरे दोस्त और टॉपर सभी खुशियाँ और अफसोस मना रहे थे की हमने क्या पाया और क्या खोया, सब तो छूट ही रहा था वो यादें, और भी जो शायद में बयां करके अपनी आँखे नम कर लू पर नही अभी खुशियाँ ही आयी है तो खुश रहने दो, हाँ मैंने fb  खोली और देखा कि रात के 12 बजे भी वो online थी मैंने उस से कहा की कल आखिरी दिन है उसका जबाब आया" हाँ " मैंने कहा तो मिले कल उसने रिप्लाई दिया "OK"
मुझे याद हैं मुझे उस पूरी रात नींद नहीं आई थी हम सभी दोस्त जागे थे सुबह नींद मैं पेपर दिया  , उस दिन पेपर सिर्फ फॉर्मल्टी था सभी जल्दी जल्दी बाहर आ गए थी हम लोगो एक दूसरों की शर्ट पर अपने अपने भाव उसके प्रति प्रकट करने लगे
मैने सभी से मिलने की कोशिश की उसके बाद
हम Girls के साथ गए जहाँ हम सभी से मिले तभी कैप्टन साहिबा ने आकर हमारी शर्ट पर लिखा "मुझे समझना मुश्किल ही नही नामुंकिन है "
ये उस लडकी के शब्द थे जो अक्सर निगाहों से बात करती थी ,जब सब लोगो से मिल लिया तो मुझसे दूर खडी वो मुझे  देख रही थी पास आने की जहमत भी नही कर पा रही थी वो तभी उसकी रूममैट उस मेरे करीब लायी और बोली मिल ले फिर पता नही कब मिले मेरे मुह से निकला "हाँ", बस मैं उस ही देख रहा था पहली बार था जब मैंने उस उतनी करीब से देखा था उस दिन ऐसा लग रहा था मानो सूखे बंजर खेतों पर बरसात हो गई हो और उसका मेरे हाथ को थामना बंजर भूमी पर बारिश की पहली बूंद का स्पर्श का एहसास करा रहा था उसने मेरे शर्ट पर लिखा " शायरियाँ अच्छी लिखते हो ' मुकम्मल हो गया था उस दिन मेरा उसको लिखना ,
वो कॉलेज का आखिरी दिन था जिसने मुझे रुलाया था सभी लोग हॉस्टल को छोड़कर अपने अपने घर जा चुके थे मेरा घर करीब था इस लिए मैंने लेट जाने का फैसला किया था उस रात मैं अपने दो दोस्तों के साथ हॉस्टल की छत पर सोया था पूरी रात नींद नही आ आई सब जगह बस यही लग रहा था की कोई बुला रहा हैं खाना खाने को, महफ़िल सजाने को, सुबह हो गई थी और मैंने भी अपने बैग तैयार कर हॉस्टल को हमेशा हमेशा के लियेे अलविदा कहा था
उस दिन मेरे हँसने और मुस्कराने की दोनो वजह मुझसे दूर हो रही थी मैं छोड़ आया था वो सब जिसकी वजह से मुझे उन तीन सालों में लोगो ने जाना ये पंक्तियां इसका उदारण हैं
तुझसे मिलने से पहले मुझे कुछ नही आता था,
तेरी छाँव के दरमियाँ ही मैं सुकूँ पाता था,
वो वक़्त भी कितना हसीं था यार
जब पूरी यूनीवर्सिटी में, मैं तेरे नाम से जाना जाता था,
सिर्फ यादें ही तो बनाई थी मैंने वो ही सिर्फ साथ थी उस रोज मेरे , मैं घर आ चुका था मैसेजो से उससे बात कर लिया करता था ऐसा पहली बार था जब अपना घर भी पराया लग रहा था। नही भुला पा रहा था मैं उन यादो को जो मैंने उन तीन सालों मे अपने दोस्तों और उस पागल लड़की के साथ बितायी थी मैं थामना चाहता था वक्त को और गुज़ारना चाहता था अपनी ताउम्र उन लम्हों मे ,पर होता ही कहाँ है वो सब जो हम चाहते हैं ।कुछ ऐसा ही हुआ हमारे दरमियाँ, हम करीब होकर भी दूर थे, उसके मैसेज भी कम आते थे और भी बहुत कुछ,
शायद मैं उस पर हक जता रहा था और एक दिन मैंने उससे कहा  यार प्लीज मुझे ब्लॉक कर दे  शायद ये पहली बार था जब मैंने उससे ये लफ्ज कह थे। उसने कोई जबाब नही दिया। फिर मेरे द्वारा मेसेजो को सीन कर छोड़ दिया वक्त बीतता रहा नाराज होना और मनाने का सिलसिला जारी रहा। बात 16अगस्त 2019 की है जब मेरे दोस्त जो कि मथुरा में रहता है उसने कहा चल यार कॉलेज चलते है मार्कशीट लानी है मैंने हाँ करदी 17 अगस्त को मैं कॉलेज मैं था मैंने उसके लिए फॉर्म लिंए और उसके आने तक का इंतजार किया जब वो आ गया तो हम लोग सेंट्रल ऑफिस की और जाने लगे हमारी तीन क्लास मैट और आयी थी वो बोला रुक यार मोटू  और आ रही मोटू हम उसकी रूममैट को बोलते थे  जो हमारे प्रोजेक्ट का भी हिस्सा थी हम 5 मिनट इंतजार करते रहे वो  नहीं दिखी तो मैंने कहा चल भाई और कितना टाईम लगायेगा। तभी वो बोला ले आ गयी। जब मैंने उसकी और देखा तो देखता ही रहा क्युकी उसके साथ वो भी आ रही थी जिसके लिए मैं हर रोज मन्नत करता था जिसका जिक्र मेरी जुबां पर रहता था नीली जींस और ब्लैक टॉप पर सफेद बिंदिया ,काले आसमां में टिमटिमाते सितारों की और उसका चेहरा उस काले आसमां में चाँद सा प्रतीत हो रहा था, ना जाने क्यु ये हवाएं हमसे इतना जलती है एक हम होते है जो उनकी जुल्फों को अपनी उंगलियो में समेटने की ख्वाहिश रखते है और एक ये कम्बख्त हवाएं जो बार बार उनकी जुल्फों को स्पर्श करती है, इन हवाओं को भी छेड़खानी की धाराओं में हवालात की हवा खिलानी चाहिए। खैर बात हवाओं की ही नही थी शिकायत तो मुझे धूप से भी थी जो उसके रुखसारों से रुखसत हो मुझे जला रही थी प्रेम होता ही ऐसा है जिसमे हम हक जताने लगते है भूल जाते है उस शक्स के हर रिश्ते को और चाहते हैं कि वो सिर्फ हमारा रहे पर ऐसा कहाँ होता है ये समाज और इसके बंधन कभी होने ही नही देते संपूर्ण रूप से किसी को किसी का ये बांध कर रखते है हमें और जिस दिन हम खुदको और खुद के रिश्तों को आजाद कर लेते है उस दिन हमें समाज और इसे लोग भुला देते हैं पुरानी कहानियों की तरह या कहूँ  अपनी गलतियों की तरह। गलती तो उस दिन मुझसे हुईं थी जो मैं  बयां ना कर सका अपने जज्बातो को उसके दरमियाँ , दरमियाँ हाँ वो मेरे दरमियाँ आ चुकी थी और मैं खोया हुआ था चाँद और तारों में तभी मोटू ने कहा "शायर साहब कहाँ खोये हुए मैंने अचानक सिर हिलाते हुए बोला "कहीँ नही" मेरे दोस्त ने फॉर्म भी लिया था अब उसका और मोटू का फॉर्म बाकी था तब मेरा दोस्त बोला तू भरा दे भी इनका फॉर्म मैंने हाँ में सिर हिला दिया। मैं उसका फॉर्म भरने के बाद हम लोगो ने उस पर दस्तखत करा लिए और ऑफिस में जमा कर दिया। उसके बाद मुझे कुछ काम था तो मैं वो करने चला गया जब तक मैं लौट कर आया वो जा चुकी
मैंने उससे रुकने के लिए कहा पर वो जा चुकी थी
शायद आखिरी मुलाकात थी वो हमारी, वो चाहती तो रुक सकती थी मिल सकती थी मुझ से पर नही ऐसा नही हुआ। वक्त होता ही इतना कठोर. है जो तोड़ देता है लोगो के सपनो को , शाम को उसका मैसेज आया पूछ रही थी तुम कहाँ चले गए थे मैंने बताया पर वो कहते हैं कि आरोपो और प्रत्यारोपो के बिना कभी भी सुलह नही होती कुछ ऐसा ही था हमारे इस बेनाम रिश्ते में, कुछ भावनात्मक पलों के बाद अक्सर हम थम जाते है और अफसोस करते है। यही भावनात्मक पल और अफसोस जारी रखते हैं किसी रिश्ते को और उस रिश्ते के सम्मान को, वो ऐसा रिश्ता चाहती थी जिसमे बंधन न हो, हम ना हो, और जिसका कोई नाम ना हो, वो कहती थी, तुम भी जैसे हो वैसे ही रहो। मैं बात तो करती हूँ तुमसे, और मैं उससे अक्सर कहता था कि "बेनाम रिश्ते अक्सर बदनाम होते है, प्रेम सिर्फ कृष्ण और राधा का पवित्र माना जाता है वरना इनके सिवा हर प्रेम परीक्षाओं से गुजरा है, ये वही समाज है जिसने पवित्रता के लिए अग्नि परीक्षा लीं हैं "
शायद हमारी ये बाते हमारे रिश्ते को बदल चुकी थी
हम कोशों दूर निकल आये थे उन कस्मों और वादों से जिनमें एक दूजे का साथ जरूरी होता है हमारे प्रेम से पहले हमारे लिए हमारा परिवार और उनकी खुशीयां थी हम सम्भालते थे  एक दूसरे को, नाराज होते थे एक दूसरे से, मैं अक्सर उस से पूछ बैठता अगर हमारी शादी हुई तो हम अपने बच्चे का नाम #शिवाज रखेंगे, वो बेजुबां हो जाती थी अक्सर मेरे बेबकूफी भरे सवालों पर, मैं छेड देता था अक्सर किस्सा हमारे रिश्ते को एक नाम देने का, और वो खामोश हो जाती थी मासुमियत उसके चेहरे से झलकती थी, पर उसकी बाते हमेशा तार्किक होती थी,
यही बाते हमारे इस बेनाम रिश्ते को एक नाम देती थी वो रिश्ता जो समाज और उसकी चारदीवारों में रहना चाहता था, जो प्रेम की रीति को और उसके रिवाजों को समझाना चाहता था। कि प्रेम जोड़ता है तोड़ता नही बताना चाहता था। कि सपनो की कीमत अपनो की उम्मीदों से बडी नही होती ये बेनाम रिश्ता हासिल कर चुका था एक नाम
जिसे मैं उसको अक्सर बताता था की हमारा प्रेम नादान प्रेम नही"परिपक्व प्रेम" है जिस प्रकार गुलाब की अधिखिली कली युवा प्रेम को आकर्षित करती है परंतु वैवाहिक बंधन मैं पूर्ण रूप से खिले ही पुष्प को ही वरमाला में प्रयोग किया जाता है|
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"क्लीनिक प्लस वाली"

 प्रस्तावना: ये कहानी छोटे से कस्बे में रहने वाले दो 16 साल के बच्चों की है। प्रेम की अलग अलग परिभाषाओं की सहायता से समाज के बनाए रास्तों पर...